गुब्बारा

‘देखो भाई, इस हाल की हर दीवार को और छत को गुब्बारों से सजाना है । आज मेरी बिटिया का जन्म दिन है । गुब्बारे हरेक रंग के होने चाहिएँ, अलग-अलग डिज़ाईन के होने चाहिएँ । और हाँ छत के गुब्बारों के लिए गैस अच्छे से भरना । एकाध दिन तक छत पर टँगे रहने चाहिएँ। पैसों की चिन्ता मत करना ।’ गुब्बारे वाला अपने काम पर लग गया था । वह मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि कम से कम तीन सौ गुब्बारे तो इस हाल में लग ही जायेंगे । एक से एक बढ़िया गुब्बारे निकाले उस गुब्बारे वाले ने । तीन सौ गुब्बारों को मुँह से फुलाना आसान नहीं था इसलिए अपने साथ मशीन लाया था और गैस के गुब्बारों के लिए गैस का सिलंेडर भी साथ लाया था । खूबसूरत रंगों वाले गुब्बारे जब हवा से भर जाते तो बहुत ही सुन्दर लगते । उन पर छपे डिजाईन जब फूल कर बड़े हो जाते तो वे भी खूबसूरत दिखते । यही हाल गैस वाले गुब्बारों का था । गैस भर जाने के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता । गुब्बारों को लगता कि वे आकाश की सैर करेंगे क्योंकि उन्होंने अपने भाई-बन्धुओं को 26 जनवरी और 15 अगस्त पर आकाश की सैर करते देखा था । पर इनके और आकाश की छत के बीच में हाल की छत आ जाती थी । और गुब्बारों का सिर छत से जा टकराता । लाख कोशिशंें करने के बाद भी वे छत-भेदन नहीं कर पा रहे थे । और कोई चारा न देख गैस वाले गुब्बारे पहले आपस में एक दूसरे को देखते फिर अपने ही कुछ भाई-बन्धुओं को कमरे की दीवारों पर चिपके हुए देखते । उन्हें लगता कि वे कम से कम इतना स्वतंत्र तो हैं कि हिल डुल सकते हैं । चिपके हुए गुब्बारे अपने छत वाले भाई-बन्धुओं को केवल अपनी पलकें उठा कर ही देख सकते थे । उनकी तो गर्दन भी नहीं हिलती थी । वे यही सोच कर खुश हो रहे थे कि अभी बच्चे आयेंगे और उन्हें छुएंगे और मज़ा लेंगे । यह बात छत वाले गुब्बारों में कहाँ । यही सोच सोच कर वे खुद को तसल्ली दिये जा रहे थे । कुछ ही देर में हाल गुब्बारों से पट गया था । हर तरफ रंग-बिरंगे गुब्बारे ही नज़र आ रहे थे । जन्म-दिन की पार्टी का समय भी हो चुका था । किसी भी पल बच्चे धमाका करने वाले थे ।

‘गुब्बारे वाले भइया तुम यहीं रुको । जब तक मैं न कहँू तुम मत जाना ।’ बिटिया की मम्मी बोली । ‘ठीक है’ गुब्बारे वाला हाल के बाहर एक किनारे में जाकर स्टूल पर बैठ गया और अपने थके हाथों को आराम देने की कोशिश करने लगा । थोड़ी ही देर में मेहमान और बच्चे आने लगे थे । हाल में घुसते ही बच्चे गुब्बारों को देख मचल उठे थे और माँ-बाप के हाथ छुड़ा कर सीधा जा पहुँचे गुब्बारों के पास । गुब्बारे बच्चों को अपने पास आता देख कर खुश हो उठे थे । छत पर टँगे गुब्बारों को मानो चिढ़ा रहे थे । इतने में दीवार वाले गुब्बारों ने देखा कि कुछ बच्चों के हाथ में चाट खाने वाले स्टिक है । ‘फटाक’ एक गुब्बारा शहीद हो गया था । एक बच्चे ने उसमें स्टिक घुसा दी थी । अचानक हुई इस आवाज़ से बच्चे और बड़े मेहमान तो एक बार चौंक गए, बाकी गुब्बारे भी डर कर सहम गये । ‘यह क्या हो गया ?’ गुब्बारे आपस में बड़बड़ाए ही थे कि ‘फटाक’ एक और गुब्बारा शहीद हो गया । गुब्बारों को यह समझ आ गया था कि उन्हें बच्चों की खुशी के लिए शहीद होना पड़ेगा क्योंकि बच्चे गुब्बारों को फोड़ने के बाद खुश होकर उछल कूद करते । थोड़ी देर खुशी मनाने के बाद दूसरे गुब्बारों का नम्बर आ जाता । कुछ बच्चों के पास स्टिक नहीं थी तो वे घूँसे मार मार कर गुब्बारे फोड़ रहे थे । घूँसे खाने के बाद गुब्बारे स्टिक द्वारा फोड़े गए गुब्बारों से ईष्र्या कर रहे थे । घूँसे उन्हें ज्यादा तकलीफ़ पहुँचा रहे थे । छत वाले गुब्बारे स्तब्ध थे । इतनी देर में दीवार वाले वे गुब्बारे शहीद हो गए जो बच्चों के हाथ की हद में आ रहे थे । जो ऊपर थे वे सुरक्षित थे और अपने आप को और भी ऊपर घसीटने की कोशिश कर रहे थे । चूँकि बच्चों के हाथ उन तक नहीं पहुँच रहे थे बच्चे उदास हो गये थे । यह देख कर बिटिया की मम्मी ने गुब्बारे वाले को बुलाया और कहा ‘भइया, जल्दी से ये फटे गुब्बारे हटा लो और इनकी जगह नये गुब्बारे लगा दो ।’ गुब्बारे वाला हालाँकि फटे हुए गुब्बारों को देखकर एक बार तो उदास हुआ था क्योंकि वह अक्सर बच्चों को गुब्बारे बेचने के बाद उन्हें खेलते देखकर खुश होता था । पर यह तो उसका व्यवसाय था । उसे आज ज्यादा अच्छा काम मिल गया था । आज घर जाते हुए वह बाज़ार से अपने बच्चों के लिए कुछ खाने के लिए खरीद कर ले जायेगा ।

बड़ी सी प्लास्टिक की पारदर्शी थैली में पड़े नये गुब्बारे अपने भाई-बन्धुओं का हश्र देख चुके थे । जब जब गुब्बारे वाला उसमें नया गुब्बारा निकालने के लिए हाथ डालता तो वह उस हाथ से फिसल कर बचने की कोशिश करते । पर कब तक ? आखिर तो हाथ में आना ही था । गुब्बारे वाले ने सूनी हो चुकी दीवारों को फिर से गुब्बारों से पाट दिया था और बच्चे खुश हो गये थे । इतनी देर में बिटिया तैयार हो कर केक काटने के लिए आ गई थी । तालियाँ बजीं और जन्म-दिन का चिर-परिचित गीत बजा । केक पर लगी मोमबत्तियाँ एक एक करके बुझा दी गईं और केवल एक मोमबत्ती जलती छोड़ दी गई । जलती हुई मोमबत्ती सोच रही थी कि मैं ही क्यों जली ? मेरी किस्मत ऐसी क्यों थी ? पर थोड़ी ही देर में उसे खुद एहसास हुआ कि वह खुद जल तो रही है पर अपना पूरा जीवन जी रही है । बुझी हुई मोमबत्तियों को डस्टबिन में फेंक दिया था यानि अपना पूरा जीवन जीने से पहले ही वे समाप्त हो गई थीं । इधर बच्चों का ध्यान गुब्बारों से हटकर केक पर केन्द्रित हो चुका था । गुब्बारों ने राहत की साँस ली । जितनी देर में केक कटा, जन्म-दिन वाली बिटिया के मुख पर पुता, प्लेटों में सजा, बच्चों में बँटा और मुँह में समाया उतनी देर के लिए मानो गुब्बारों को जीवनदान मिल गया था । केक खाने के बाद ही बच्चों को जैसे कुछ याद आ गया हो । वे फिर से गुब्बारों की ओर दौड़ पड़े थे । उन्हें अपनी ओर आता देखकर गुब्बारों ने अपनी आँखें बन्द कर ली थीं । कुछ ही देर में एक से एक सुन्दर गुब्बारे फूटते गए और उनकी फटाक फटाक बच्चों की खुशी में विलीन होती गई । छत पर टँगे गुब्बारे सोच रहे थे ‘हमारी तरफ तो कोई भी नहीं देख रहा । क्या हमसे बच्चे खुश नहीं ? काश हम भी नीचे होते तो बच्चों को खुशी दे पाते, फट कर ही सही । शहीद होने से पहले तो एक बार बच्चे हमें छू ही लेते । इतना भी ऊँचा होने की क्या ज़रूरत कि किसी की खुशी न दे सको । ज़मीन पर ही रहना ठीक है । नीचे पार्टी चल रही थी बच्चों की और ऊपर मन्थन कर रहे थे ‘गुब्बारे’।

परिचय - सुदर्शन खन्ना

वर्ष 1956 के जून माह में इन्दौर; मध्य प्रदेश में मेरा जन्म हुआ । पाकिस्तान से विस्थापित मेरे स्वर्गवासी पिता श्री कृष्ण कुमार जी खन्ना सरकारी सेवा में कार्यरत थे । मेरी माँ श्रीमती राज रानी खन्ना आज लगभग 82 वर्ष की हैं । मेरे जन्म के बाद पिताजी ने सेवा निवृत्ति लेकर अपने अनुभव पर आधरित निर्णय लेकर ‘मुद्र कला मन्दिर’ संस्थान की स्थापना की जहाँ विद्यार्थियों को हिन्दी-अंग्रेज़ी में टंकण व शाॅर्टहॅण्ड की कला सिखाई जाने लगी । 1962 में दिल्ली स्थानांतरित होने पर मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक की उपाधि प्राप्त की तथा पिताजी के साथ कार्य में जुड़ गया । कार्य की प्रकृति के कारण अनगिनत विद्वतजनों के सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने को मिला । पिताजी ने कार्य में पारंगत होने के लिए कड़ाई से सिखाया जिसके लिए मैं आज भी नत-मस्तक हूँ । विद्वानों की पिताजी के साथ चर्चा होने से वैसी ही विचारधारा बनी । नवभारत टाइम्स में अनेक प्रबुद्धजनों के ब्लाॅग्स पढ़ता हूँ जिनसे प्रेरित होकर मैंने भी ‘सुदर्शन नवयुग’ नामक ब्लाॅग आरंभ कर कुछ लिखने का विचार बनाया है । आशा करता हूँ मेरे सीमित शैक्षिक ज्ञान से अभिप्रेरित रचनाएँ 'जय विजय 'के सम्माननीय लेखकों व पाठकों को पसन्द आयेंगी । Mobile No.9811332632 (Delhi) Email: mudrakala@gmail.com