ग़ज़ल

फिर वे अपनी दुकानें सजाने लगे हैं
और भीड़ लोगों की बढ़ाने लगे हैं
जिसे हाथ पकड़कर चलना सिखाया
वे ही हमको अब आँखें दिखाने लगे हैं
यह जानकर कि वो अपराधी हैं फिर भी
लालच के खातिर उसे बचाने लगे हैं
कल तक खुलती नहीं थी जिनकी जुबां
वे भी आज शोर मचाने लगे हैं
जो हाथ थे कभी अहिंसा के पुजारी यहाँ
वे हाथ भी अब खंजर उठाने लगे हैं
हालातों से परेशान रहा रमेश हमेशा
लोग उसे देखकर अब कतराने लगे हैं
— रमेश मनोहरा

rameshmanohara@gmail.com'

परिचय - रमेश मनोहरा

शीतला माता गली, जावरा (म.प्र.) जिला रतलाम, पिन - 457226 मो 9479662215