व्यंग्य- चेला चंटाल

अक्सर गुरु घंटाल की चर्चा होती है. मैंने विचार किया कि अगर गुरु घंटाल हो सकता है तो चेला चंटाल क्यों नहीं. लखनऊ के सनकी जी ने लिखा है-
गुरु-गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय
बलिहारी है शिष्य की सिगरेट दियो पिलाय
इस दोहे के हिसाब से शिष्य से मुफ़्त सिगरेट लेकर पीने वाला गुरु अगर गुरु घंटाल हो सकता है तो अपने मतलब के लिये गुरु को सिगरेट पिलाने वाला शिष्य “चेला चंटाल” क्यों नहीं हो सकता.
अक्सर कुछ युवा रचनाकार (कवि-कवयित्री) मुझे फोन करते हैं-दादा, साहित्यिक मार्गदर्शन हेतु आपके दर्शन करने की इच्छा है. मैं कहता हूँ- अगर उद्देश्य सिर्फ़ मार्गदर्शन है तो आपका स्वागत है. पर अगर मुझसे कवि सम्मेलन की भी अपेक्षा रखते हैं तो आपको निराशा होगी.
कुछ तो इसी लेवल पर किनारा कर लेते हैं. पर कुछ पूरी विनम्रता से कहते हैं- दादा, हमारे लिये तो बस आपका दर्शन ही पर्याप्त है. फिर वे दर्शन करने भी आने लगते हैं. उनमें से कुछ तो बाकायदा गुरु पूर्णिमा को भी आने लगते हैं. मैं मार्गदर्शन के साथ ही गोष्ठियों के माध्यम से साहित्यिक क्षेत्र से उनका परिचय कराता हूँ. पर कुछ समय बाद उनका भी मंतव्य स्पष्ट हो जाता है जब वे यह कहते हैं- दादा, कभी किसी कवि सम्मेलन में भी ले चलिये. पैसे की बात नहीं है, आपको चाहे कुछ भी मिले. मुझे तो मार्गव्यय ही मिल जाये, वही बहुत है.
फिर कुछ समय बाद उन्हें मार्गव्यय भी कम लगने लगता है. वे मेरे मानदेय से अपने मानदेय की तुलना करने लगते हैं. फिर धीरे-धीरे वे भी किनारा कर लेते हैं. इसलिए अब तो मैं ऐसे युवाओं को आरंभ में ही एक दोहा सुना देता हूँ, जिसे वे गुरुमंत्र मानकर नये गुरु की तलाश कर लेते हैं-
उसे बनाओ काव्य-गुरु जिससे निकले काम.
कविता लिखकर दे तुम्हें या फिर दे प्रोग्राम.
(नोट-1. सारे चेले ऐसे नहीं होते, कुछ इसके अपवाद भी होते हैं.
2. “चेला-चंटाल” में शिष्य और शिष्या दोनों ही शामिल हैं.)
डाॅ. कमलेश द्विवेदी
कानपुर
मो.9140282859