दलित-मुस्लिम एकता का सच

स्वामी श्रद्धानन्द अविभाजित भारत में कांग्रेस के ऐसे पहले सदस्य है जिन्होंने कांग्रेस से इस कारण से त्यागपत्र दे दिया था क्यूंकि महात्मा गांधी को बार बार दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों से अवगत करवाने के बाद भी गांधी जी ने गंभीरता से दलित उत्थान का कार्य में रूचि नहीं दिखाई। उल्टा गांधी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता का झुनझुना बजाते रहे जिसका परिणाम भारत के दो टुकड़े होकर निकला। बात 17 अगस्त 1921 की है। दिल्ली में कांग्रेस कमेटी ने चमार जाति के चौधरियों को बुलाकर कांग्रेस के प्रतिनिधि ने चार-चार आने के कांग्रेस के अधिक से अधिक सदस्य बनाने के लिए कहा। इस पर चमारों के चौधरियों ने कहा जब तक उन्हें सार्वजानिक कुओं से पानी भरने की अनुमति नहीं मिलेगी तब तक वे कांग्रेस से नहीं जुड़ेंगे। इस पर कांग्रेस दफ्तर में बैठा हुआ प्रतिनिधि गर्मी दिखाते हुए बोला चमारों को उनका हक बाद में भी मिल सकता हैं। पहले स्वराज्य लेना है। इस पर एक चमार युवक उत्तेजित होते हुए बोला अगर चमारों को उनका हक नहीं मिलेगा तो हम भी देखते है कि तुम स्वराज्य का लड्डू कैसे खाते हो। मामला सुलझने के स्थान पर ओर अधिक उलझ गया। स्वामी श्रद्धानन्द को जब यह वाक्या पता चला तो उन्होंने सितम्बर 1921 में महात्मा गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस द्वारा दलितों ने लिए सार्वजानिक कुओं को खोलने के लिए कहा। स्वामी जी अपने भाषणों में भी कुओं को चमारों के लिए खोलने की बात करने लगे। इस पर सदर, दिल्ली के एक मुस्लिम व्यापारी ने घोषणा कर दी कि अगर चमारों को कुओं पर चढ़ाया गया तो मुस्लमान उनका मरते दम तक विरोध करेंगे क्यूंकि वे लोग मरे हुए जानवरों का मांस खाते हैं। इस पर स्वामी श्रद्धानन्द ने प्रतिउत्तर देते हुए कहा- मैं हज़ारों ऐसे अछूत भाइयों को जानता हूँ जो न मांस खाते है और न शराब पीते है। जो थोड़े बहुत खाते हैं उनमें आर्यसमाज कार्य करके छुड़ाने का प्रयास कर रहा हैं। मगर मैं ऐसे अनेक हिन्दुओं और मुसलमानों को जानता हूँ जो मांसभक्षी हैं। क्या उन्हें भी इस कारण से कुओं से पानी भरने से प्रतिबंधित कर दिया जाये? स्वामी जी के जोरदार उत्तर को सुनकर मुस्लमान चुप बैठ गए।

(सन्दर्भ- Inside the Congress पृष्ठ संख्या 134,135)

स्वामी जी ने जब देखा कि अछूतों को सार्वजानिक कुँए से पानी भरने का अधिकार नहीं मिल रहा है तो उन्होंने 13, फरवरी 1924 को अछूतों के साथ मिलकर दिल्ली में जुलुस निकाला। वे अनेक कुओं पर गए और सार्वजानिक रूप से पानी पिया। एक कुँए मुसलमानों से विवाद हुआ जिन्होंने उन्हें पानी भरने से रोका। इस विवाद में पत्थरबाजी हुई जिसमें स्वामी जी के साथ आये अछूतों और आर्यों को चोटें आई। बाद में पुलिस ने आकर दखल दिया।

सन्दर्भ- Home Political Documents , 1924, Feb 25, National Archives of India

ध्यान दीजिये कि डॉ अम्बेडकर ने महाड़ सत्याग्रह 20 मार्च 1927 को किया था। जब उन्होंने महाराष्ट्र के रत्नागिरी में महाड़ नामक स्थान पर सार्वजानिक तालाब से अछूतों के पानी भरने के लिए संघर्ष किया। जबकि स्वामी श्रद्धानन्द ने डॉ अम्बेडकर से तीन वर्ष पहले अछूतों को सार्वजानिक कुओं से पानी भरने के अधिकारों के लिए देश की राजधानी दिल्ली में 13 फरवरी 1924 में प्रयास किया। आज दलित नेता और बुद्धिजीवी डॉ अम्बेडकर का नाम तो बड़े गर्व से लेते है। मगर स्वामी श्रद्धानन्द का नाम स्मरण कभी नहीं करते। जानने योग्य तथ्य यह भी है कि स्वामी श्रद्धानन्द सवर्ण समाज में जन्म लेकर अछूतों के लिए कार्य कर रहे थे। जबकि डॉ अम्बेडकर अपने ही समाज के लिए संघर्षरत थे।

ध्यान दीजिये दलित-मुस्लिम एकता एक छदम कल्पना भर हैं। यथार्थ में मुसलमानों की कोशिश दलितों को प्रताड़ित कर उन्हें इस्लाम स्वीकार करवा द्वितीय श्रेणी का मुसलमान बनाने की रहती हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। मुगलिया काल से यही होता आया है।

डॉ विवेक आर्य