प्रकृति-संरक्षण की चिन्ता : संस्कृत- काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

परि+ आवरण शब्दों की संधि करने पर पर्यावरण शब्द बनता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है जो परित: (चारों ओर) आवृत  किए हुए हैं ।अब प्रश्न उठता है कि कौन किसे आवृत किए हुए हैं, इसका उत्तर है समस्त जीव धारियों को अजैविक या भौतिक पदार्थ घेरे हुए हैं । जीवधारियों तथा वनस्पतियों के चारों और को जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं।

प्राचीन काल से ही मानव और पर्यावरण में घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । इस महत्त्व को वैदिक साहित्य से लेकर लौकिक साहित्य के ग्रन्थों में देखा जा सकता है । इन सभी ग्रन्थों में पर्यावरण को देवता के रुप में दिखाया गया है । पर्यावरण के प्रमुख घटक हैं- जल, वायु और मृदा ।

फिटिंग के अनुसार-“ जीवों के पारिस्थितिक कारकों का योग पर्यावरण है ।’’

डॉक्टर हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मध्य प्रदेश के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर संजय कुमार यादव ने अपनी पुस्तक “संस्कृत काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरूप” में  इन्हीं पर्यावरणीय  तत्वों का विशद विवेचन किया है।

डॉ. संजय इस पुस्तक में कुल 6 अध्याय हैं –

  1. 1. वेदों में पर्यावरण का दैव स्वरूप

2.आर्ष-काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

  1. 3. गद्य-काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

4.पद्य काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

(क) महाकाव्य

(ख) गीतिकाव्य

(ग) मुक्तक

  1. 5. चम्पूकाव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

6.रुपकों में पर्यावरण का दैव स्वरुप ।

 

प्रथम अध्याय में लेखक ने ऋग्वेद, यजुर्वेद (नमो वृक्षेभ्य:, नमो वन्याय च, वनानां पतये नम:), अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण ,छान्दोग्य उपनिषद, मत्स्यपुराण, श्रीमदभगवतगीता आदि की उदाहरण द्वारा पर्यावरण के महत्व को समझाया  है ।

द्वितीय अध्याय में आर्ष-काव्यों कें अन्तर्गत रामायण, महाभारत, स्कन्दपुराण विष्णुपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि के उदाहरण द्वारा पर्यावर्णीय तत्वों के महत्व को बताया गया है ।

तृतीय अध्याय में गद्य काव्यों अवंतिसुन्दरी, दशकुमारचरितम्, कादम्बरी, वासवदत्ता, शिवराजविजयम् (कदलीदलकुञ्जायितस्य एतत्कुटीरस्य समन्तात् पुष्पवाटिका, पूर्वत: परम पवित्र पानीयं परस्सहस्र-पुण्डरीक पटलपरिलसितंपत्रिकुलकुजितपूजितं पय: पूरितं सर: आसीत् । दक्षिणतश्चैको निर्झरझर्झर ध्वनि ध्वनित दिगन्तर फल पटाला$स्वाद चपलित चञ्चुपतंगकुला$$क्रमणाधिक विनत शाख शाखि समूह व्याप्त: सुन्दर कन्दर: पर्वत: पर्वतखण्ड: आसीत्) , आदि के उदाहरण द्वारा पर्यावरण के संरक्षण को समझाया गया है ।

 चतुर्थ अध्याय में तीन खण्ड हैं (क) महाकाव्य -इसके अंतर्गत किरातार्जुनीयम् (तरसा भुवनानि यो विभर्ति ध्वनित ब्रह्मयत: परपवित्रम्। परितो दुरितानि य: पुनीते शिव तस्मै पवनात्मने नमस्ते ॥), कुमारसंभवम्, रघुवंशम्, शिशुपालवधम्, मेघदूतम्, भट्टिकाव्य, नैषधीयचरितम्, बुद्धचरितम्, विक्रमांकदेवचरितम्, । (ख) गीतिकाव्य- हिमाद्रिपुत्रभिनंदन (श्रीकृष्ण सेमवाल), गजेन्द्रमोक्ष (डा.गोपीनाथ टण्डन )., श्रीसूर्यशार्दूलविक्रीडितम्, कर्णानंद, । मुक्तककाव्य-वैराग्यशतक । आदि के उदाहरण दिये है ।

पञ्चम् अध्याय चम्पू-काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप’ में मदालसाचम्पू, यशस्तिलकचम्पू, चम्पूरामायण,  नलचम्पू आदि रचनाओं में पर्यावरणीय तत्त्वों की मीमांसा की गयी है ।

षष्ठम् अध्याय रुपकों में पर्यावरण का दैव स्वरुप” में अभिज्ञानशाकुन्तलम्, उत्तररामचरितम्, श्रीमद्भगवतगीता,प्रतिमानाटकम्, अविमारकम्, पंचरात्रम्, अभिषेकनाटकम्, महावीरचरितम्, नागानन्द, रत्नावली, मृच्छकटिकम्, वेणीसंहारम्, विक्रमोर्वशीयम्, अनर्घराघव, प्रबोधचन्द्रोदय आदि नाटकों में पर्यावरणीय तत्त्वों की गवेषणा की गयी है ।

डॉ. संजय यादव बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । वह जितने अच्छे कवि आलोचक और समीक्षक हैं उतने ही सहज और सरल इंसान भी । उनके अब तक 50 से अधिक शोधपत्र देश -विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

अब तक उनकी पांच ‍‌ पुस्तकें 1-दण्डिकालीन जन जीवन 2-संस्कृत काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरूप 3-दण्डिसूक्तिरत्नम् 4-अग्निपुराण का नाट्य दर्शन 5-दण्डी: समय और साहित्य प्रकाशित हो चुकी हैं ।

पर्यावरण के दैवीय स्वरूप जैसे गूढ़ विषय को उन्होंने बहुत ही सरल भाषा में (वैदिक काल से लेकर आधुनिक ग्रन्थों तक) स्पष्ट कर दिया है जो पाठकों के लिए अत्यन्त ही सुग्राह्य रहे हो गया है । डॉ. संजय का यह आलोच्य ग्रन्थ उन शोधार्थियों के लिए अत्यन्त ही लाभप्रद है जो कि पर्यावरण पर शोध कार्य कर रहे हैं । आज जब समूचा विश्व पर्यावरण की समस्या से जूझ रहा है ऐसे वातावरण में यह ग्रन्थ तपती हुई धरती के लिए बारिश की फुहार जैसी है । आज इस पुस्तक को जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है । मौसम विज्ञान के शोधार्थी भी इस ग्रन्थ से लाभ उठा सकते हैं । आपकी लेखनी इसी प्रकार अबाध रूप से चलती रहे तथा आप नित नवीन विषयों से पाठकों को परिचित कराते रहें। अशेष मंगलकामनाएं ।

 

कृति -‘ संस्कृत- काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

कृतिकार – डा.संजय कुमार

प्रकाशक– सुरुचि कला प्रकाशन, वाराणसी,

 प्रथम संस्करण- 2010,

मूल्य 250 रू.,

पृष्ठ– 123

परिचय - अरुण निषाद

निवासी अर्जुनपुर.बेलहरी.सुलतानपुर। शोध छात्र संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय ,लखनऊ। ७७ ,बीरबल साहनी शोध छात्रावास , लखनऊ विश्वविद्यालय ,लखनऊ। मो.9454067032