पर्यावरण

आधुनिक विकास बनाम बाघ और अन्य वन्यजीव

बाघ का नाम सुनते ही एक आम भारतीय का सिर गर्व से ऊठ जाता है। भारतीय वन्य प्राणिजगत का यह सबसे बड़ा, ताकतवर, विलक्षण और अत्यन्त सुन्दर प्राणी होता है। पहले भारत का राष्ट्रीय पशु सिंह था, परन्तु बाद में उसकी जगह अपनी विशिष्ट गुणों शक्ति और अपने आन-बान-शान के प्रतीक बाघ के विलक्षण गुणों […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

आर्यसमाज के विद्वानों, नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को निःस्वार्थ भाव से एवं निर्भीकतापूर्वक वेदों का प्रचार करना चाहिये

ओ३म् महर्षि दयानन्द के आगमन से लोगों को यह ज्ञात हुआ कि विद्या व ज्ञान भी सत्य एवं असत्य दो प्रकार का हो सकता है। हम बचपन में माता-पिता द्वारा की जाने वाली मूर्तिपूजा एवं अल्पज्ञ मनुष्यों द्वारा रचित प्रार्थनाओं व आरती आदि करते थे। ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के स्वाध्याय एवं आर्य विद्वानों के […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर के कुछ प्रमुख कार्य  और हमारा कर्तव्य

ओ३म् हम इस संसार में रहते हैं। हमें यह सृष्टि बनी बनाई मिली है। इसमें सूर्य, चन्द्र, पृथिवी को तो हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। हम यह भी जानते हैं कि रात्रि के समय में हमें जो तारे आदि दिखाई देते हैं वह भी सब हमारे सूर्य के समान ग्रह व नक्षत्र आदि हैं। वैज्ञानिक […]

गीतिका/ग़ज़ल

“संभलते कैसे”

अदाओं से तेरी संभलते तो संभलते कैसे निगाहों से तेरी बचके निकलते तो निकलते कैसे, चांद गायब था शब भर तुम भी न आए छत पर फलक पर सितारे चमकते तो चमकते कैसे, डालियों को सीखना है तुमसे मोहब्बत की अदा फूलों से लदकर लचकते तो लचकते कैसे, तुम्हारे आने से आ जाती है फूलों […]

गीत/नवगीत

सुगत सवैया (छंद) – कब होगी पूरी अभिलाषा

मन रूपी घट  बसे साँवरे,फिर भी तृष्णा रही अधूरी । जैसे वन वन ढूँढ़ रहा मृग ,छिपी हुई मन में कस्तूरी । लोभ ,मोह अरु मद माया में ,मृग तृष्णा सा मन भटका है । जनम मृत्यु अरु पाप पुण्य के ,उलट फेर में ही अटका है । तज सब बंध दरश कब दोगे ,कब […]

भजन/भावगीत

वाणी-वंदना

मातु शारदे,नमन् कर रहा,तेरा नित अभिनंदन है ! ज्ञान की देवी,हंसवाहिनी,तू माथे का चंदन है !! अक्षर जन्मा है तुझसे ही, तुझसे ही सुर बिखरे हैं वाणी तूने ही दी सबको, चेतन-जड़ सब निखरे हैं दो विवेक और नवल चेतना,तेरा तो अभिनंदन है ! ज्ञान की देवी,हंसवाहिनी,तू माथे का चंदन है !! कर दे तीक्ष्ण […]

कविता

उजड़ जाती जिंदगी 

शराब क्या होती है ख़राब कोई कहता गम मिटा ने की दवा जिंदगी में कितने गम और कितने ही कर्म दोस्तों की शाम की महफ़िल जवां  होती ,हसीं  होती बड़े दावे बड़ी पहचान के दावे सुबह होते होजाते निढाल रातो को राह डगमगाती जैसे भूकंप आया या फिर कदम लड़खड़ाते हलक से नीचे उतर कर […]

कविता

कहाँ खो गई गोधूलि

शाम को उड़ती धूल में देखता आकाश की लालिमा सूरज की धुँधली छवि सूरज लेता शाम को सबसे अलविदा गाय के गले में बंधी घंटिया सूरज की करती हो शाम की आरती गोधूलि की धूल बन जाती गुलाल धरा से आकाश को कर देती गुलाबी नित्य ये पूजन चला करता वर्षा ऋतु  धूल और सूरज […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

थरथराते  लब  थे  मेरे  आपको  यूँ  देखकर होश उड़ जाते कभी थे आपको यूँ देखकर। जाँ  निकल जाती  थी  मेरी  आपके  दीदार से दिल  ये धड़का था हमारी आपको यूँ देखकर। कुछ हया थी और हमको डर भी उनका था जरा कुछ निगाहों की  थी  बंदिश आपको यूँ देखकर। वो जमाना  खूब था  मौसम सुहाना  […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल

मेरी कश्ती का अब तू भी सहारा हो न पायेगा, कभी मझधार दरिया का किनारा हो न पायेगा। कहीं पतवार जो टूटी …तो नैया डूब जाएगी खुदा करना जरा रहमत उतारा हो न पायेगा। मिले जन्नत अगर मुझको नहीं जाना वहाँ बस यूँ मेरी माँ के तो चरणों सेे वो प्यारा हो न पायेगा। करो […]