व्यंग्य – घर में नहीं दाने

चंद्रमा का लालच मनुष्य को तो क्या ईश्वर को भी आरंभ से ललचाता रहा है। महाअवढर दानी शिव जी विष को तो पचा गये लेकिन चंद्रमा के प्रति अपने लोभ का संवरण न कर सके। न जाने कब से भारतीय माताएँ चंदा को मामा बताकर अपने लल्लाओं को बहला रही हैं। यह बात दूसरी है कि मामा जी समय पड़ने पर ‘कृष्ण’ कम, ‘कंस’ अधिक निकल जाते हैं। ‘चंद्र’ शब्द का मोह मेरे दादाजी भी न रोक सके। उन्होंने अपने दोनों कुलदीपकों का नाम रखा था- पूर्णचंद्र और दुलीचंद। मेरे पिता ‘पूर्णचंद्र’ जी उनसे अधिक चंद्राभिमुखी निकले। उन्होंने मेरे नाम शरदचंद्र के अलावा मेरे बड़े भाइयों के नाम रखे थे-प्रतुलचंद्र, अतुलचंद्र और सुभाषचंद्र। माता जी को पिताजी का चंद्रमा पर यह एकाधिकार पसंद नहीं आया। इस लिए हमारा अनुज सिर्फ ‘संजीव’ ही रह गया। हमारी पीढ़ी में ये अपने नाम में चंद्र का भार हमसे वहन नहीं हो रहा था। इसलिए अब हम सिर्फ-‘शरद’ रह गये हैं।
दूर की चीज़े हमें हमेशा आकर्षित करती रही हैं, फिर वह चंद्रमा हो या ढोल। तुलसी बाबा के राम तो चंद्रमा के लिए माताओं की नाक में दम कर देते थे-‘कबहुँ ससि माँगत आरि करै।‘ और सूर बाबा के काह्ना को तो कहते थे-‘मैया, मैं तो चंद्र खिलौना लैहों।‘ हमारा भौगोलिक ज्ञान बढ़ा तो समझ आया कि ये चंदा प्रेम सिर्फ हम तक ही सीमित नहीं है। रूस और अमरीका भी लाईन में हैं। सन् 1969 में अमरीका तो अपना झंडा चाँद के सीने पर गाड़ आया। उसके बाद भारत के आशिकों और कवियों का दिल टूटा कि चांद की तुलना वे अपनी माशूका से करते थे वह गड्ढेदार, कुरूप धरातल के अलावा कुछ नहीं। आजकल की पढ़ी-लिखी बालाओं को भी अपनी तुलना अपमान से कम नहीं लगती। हमारे देश में औरतों और मर्दों का चाँद-प्रेम भी अद्भुत है। लड़कों को चाँद-सी मेहबूबा मिलती है। जो बाद में उनके मेहबूब को ‘चाँदवाला’ बना देती है।
मेरे सामान्य ज्ञान के अनुसार भारत अभी भी विकासशील है, विकसित नहीं। इस देश का महौल उसे विकसित बनने देगा भी नहीं। अधिकारी, नेता और जनता सभी देश से पहले अपना विकास जो करना चाहते हैं। सरकारें समग्र देश को विकसित करना चाहती है। जनता का जोर व्यक्ति पर है। जनता कहती है ‘भगवान सबका भला करे, लेकिन शुरुवात मुझसे ही होनी चाहिए।‘ इस धकमपेल में देश तो नहीं पर चोर , भ्रष्ट और कालाबाज़ारी ज़रूर विकसित होते जा रहे हैं। मेरे विद्यालयीन जीवन में भारत एक कृषि प्रधान देश होता था। उस समय देश की अस्सी प्रतिशत अर्थ व्यवस्था कृषि पर आधारित थी। देश विकसित हुआ तो देश के अस्सी प्रतिशत किसान अर्थ पर अवलंबित हो गये। ये हमारे आज़ाद भारत का विकास है। कृषि प्रधान भारत में किसानों की संख्या लगातार कम हो रही है। विकास के नाम पर हर दिन किसानों की आत्महत्या वाली सूची विकसित हो रही है।
मेरे पड़ोस की नगर पालिका की छत कई सालों से बरसात में टपक रही थी। कल तेज़ तूफान में उड़ गयी। अखबार में एक करुण चित्र छपा था- भूख की शिकार एक मुर्दा माँ की छाती को चूसते हुए मृत शिशु का। मंदिरों और मसजिदों के बाहर बैठी भिखारियों की लंबी कतार सामने गुजरती अर्थी पर लुटाए गये एक रुपये सिक्कों पर टूट पड़ी थी उस दिन। तीस साल तक सरकार को अपनी सेवा देनेवाले बीमार रामलाल काका उस दिन स्वर्ग सिधार गये जब ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के पाँच साल बाद भी उन्हें अपना धन न मिल पाया। शहर की सड़कों में एक मोटर-सायकिल पर सवार दंपति की समाधि बन गयी क्योंकि सालों से खडर का मेन होल सुधारा नहीं गया था। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत नगर पालिका के नलों में से बदबूदार मैले पानी के साथ कीड़े निकल रहे है। गरमी में लू की तपिश से भुनकर, बरसात की बाढ़ में डूबनेवाले भारत के करोड़ों लोग अब आनेवाली हाड़कपाऊ ठंड में ठिठुरकर मरने की तैयारी कर रहे हैं।
और ईमानदारी से टैक्स भरनेवाली जनता विकास को चंद्रमा पर लटकता देख रही है। हम विकास की दौड़ में अमरीका-रूस से आगे निकल कर चाँद पर पहुँचनवाले हैं। इसे कहते हैं घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने। आज़ादी की नयी सालगिरह इस विकास के साथ आनेवाली है। आप गाते रहिए-
‘ये चंदा रूस का, ना ये जापान का
ना ये अमरीकन प्यारे, ये तो है हिन्दुस्तान का।

शरद सुनेरी