बहार

नीलेश को उसके पिताजी ने सभी सुविधाएं मुहय्या करवा रखी थीं, फिर भी नीलेश कभी-कभी उदास हो जाया करता था, यह बात न तो माता-पिता से छुपी रह सकी, न नौकर-चाकरों से.
इस उदासी का कारण सम्भवतः हाल ही में एक पढ़ी हुई कहानी थी, जो उसे अपने दादाजी की आपबीती लगती थी.
”एक पिता ने लाड़-प्यार से अपने पुत्र को पाला-पोसा, अपना पेट काटकर अच्छा लिखाया-पढ़ाया और सिर उठाकर जीने के काबिल बनाया. उम्र बढ़ने के कारण बीमार और लाचार होने पर सोने के बर्तनों में खाना खाने वाला बेटा, मिट्टी के बर्तनों में नौकरों-चाकरों के हाथ सर्वेंट क्वार्टर में अलग-थलग रहने वाले अपने पिताजी के लिए खाना भिजवाकर ही अपने को धन्य मानता था. उनकी मृत्यु होने पर जब उनका सारा सामान फेंका जा रहा था, उनके पोते ने वे मिट्टी के बर्तन संभालकर रख लिए, ताकि अपने पिताजी को भी सबक सिखाने के लिए बुज़ुर्ग व अशक्त होने पर, वह इन्हीं मिट्टी के बर्तनों में उन्हें खाना खिलाए. पिताजी शर्मिन्दा तो अवश्य हुए लेकिन, जीते जी दादाजी को तो सुख नहीं ही मिला.”
जीते जी दादाजी को तो सुख न मिलना नीलेश को नागवार गुजरा, पर उसे समाधान अवश्य मिल गया था.
अब उसने असहयोग आंदोलन का रास्ता अपनाया. उसने दादाजी के बिना डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाना खाने से इनकार कर दिया. फल-स्वीट डिश-जूस-कोल्ड ड्रिंक आदि उसने तब तक खाने को मना कर दिया, जब तक दादाजी को नहीं मिलते. पुत्र के लिए जान तक कुर्बान करने वाला पिता, ऐसा कैसे होने देता!
पापाजी की आत्मा ने अपने पिताजी के साथ दुर्व्यवहार करने के लिए उन्हें कचोटा. बस फिर क्या था, उसी दिन से दादाजी भी उनके साथ डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाना व फल-स्वीट डिश-जूस-कोल्ड ड्रिंक आदि लेने लगे. डाइनिंग टेबिल पर तो जैसे बहार ही आ गई. अब भोजन के मीनू में चुटकुलों व नई-पुरानी कहानियों की सलोनी डिश भी जुड़कर रंग दिखाने, मन के सुमन खिलाने व सबके मन को महकाने लगी थी. एक भूल-सुधार से सहमा-सहमा सूना-सा माहौल हंसी-खुशी व ठिठौलियों से चहकने लगा था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।