किसी की मदद करने से आप को ख़ुशी मिलती है

लंडन में हमारी बेटी पिंकी को एक दिन काम से छुटी थी और उसी दिन उस के बेटे यानी हमारे दोहते को भी छुटी थी। दुपहिर के वक्त दोनों माँ बेटा एक दूसरे को किया खाया जाए, किया खाया जाए, पूछने लगे। तो बेटा सन्नी बोला, ” माम, आज हैम सैंडविच खाने को जी चाहता है  “, उस वक्त फ्रिज में हैम नहीं था। पिंकी बोली,  ” तू ज़रा इंतज़ार कर, मैं झट से एक दुकान से जो रेलवे क्रॉसिंग की दूसरी ओर है, पैदल चल कर ही हैम ले आती हूँ क्योंकि हाई स्ट्रीट दूर पड़ेगी ” , जब वोह क्रॉसिंग पर पहुंची तो गेट किसी कारण बंद था और पिंकी से पहले एक गोरी बज़ुर्ग महला खड़ी थी। वोह बोलने लगी कि पता नहीं कितनी देर गेट खुलने को लगे और आधे घंटे तक उस की हस्पताल की अपॉएंटमेंट है। कुछ सोच कर पिंकी बोली कि मेरा घर दो मिंट की दूरी पर है और अगर आप चाहें तो मेरे साथ मेरे घर चलें, मेरी गाडी बाहर ही पोर्च में खड़ी है और मैं आप को हस्पताल पहुंचा देती हूँ। कुछ हिचकिचाते हुए बज़ुर्ग औरत ने कह दिया, चलो। पिंकी ने घर से गाढ़ी की चाबीआं लीं और उस औरत को ठीक वक्त पर हस्पताल पहुंचा दिया। दो हफ्ते बाद एक दिन पिंकी बाहर से आई तो दरवाज़े पर फूलों का बुक्के पढ़ा था और साथ में एक लैटर था, ”  लिखा था, मिसेज, आप ने जो मेरी  मदद की  है, अगर नहीं करती तो मेरी अपॉएंटमेंट मिस हो जाती और यह मेरी बहुत ही जरूरी अपॉयन्टमेंट थी । मेरे पास शुक्रिया अदा करने के लिए कोई शब्द नहीं हैं  ” बुक्के और खत देख कर पिंकी भी इमोशनल हो गई। पिंकी सोचने लगी कि अजीब बात तो यह है कि बहुत सालों से वोह इस रास्ते से कभी गई ही नहीं थी ।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.