लघुकथा

संतुलन

चित्र प्रदर्शनी में सी-सॉ के चित्र को पहला पुरस्कार दिया जाना लगभग तय था. तर्क भी तो बड़े ही शक्तिशाली दिए जा रहे थे न! एक तरफ बड़े ध्यान से किताबें संभाले कोमलांगी लड़की, दूसरी ओर मोबाइल में खोया हट्टा-कट्टा नौजवान! लड़की भले ही शरीर से कोमलांगी थी, पर बुद्धि और ज्ञान से चट्टान जैसी मजबूत! इसलिए उसका पलड़ा भारी था और वह निश्चिंत-हर्षित. नौजवान भले ही हट्टा-कट्टा था, पर केवल भ्रमणभाष के अभिमान में चूर! एक दिन को भ्रमणभाष काम न कर पाए, तो अक्ल से पैदल का खिताब तैयार! इसलिए उसका पलड़ा हल्का था और वह कुण्ठित-शंकित.
”ऐसा क्यों?” प्रश्न उठना स्वाभाविक था.
”पहले दूरभाष के ढेरों नंबर सबको याद होते थे. जब मर्जी अपनी याददाश्त से मिलाओ और प्रेमालाप कर लो. अब तो सारे नंबर भ्रमणभाष में कैद! वह न माने तो क्या कर लोगे? याददाश्त कुंद हो जाने से यह भी भूल गए, कि किससे संपर्क साधना था.” जवाब हाजिर था.
”और किताबी ज्ञान का क्या?”
”याददाश्त को पुरजोर रखना किताबी ज्ञान से ही संभव है न!” तर्क-पर-तर्क दिए जा रहे थे.
”बात तो सही कह रहे हो दोस्त! पहले हमें यह भी याद रहता था, कि फलां प्रसंग कौन-सी पुस्तक के कौन-से पेज पर अंकित है. अब तो हर बात गूगल पर सर्च करने से मिलेगी. कई बार वह भी गलत! याद है न एक बार प्रधानमंत्री जी ने गूगल पर सर्च करके किसी देश के राष्ट्रपति को जन्मदिन की बधाई दे दी, पर उस दिन उनका जन्मदिन तो था ही नहीं!”
”ध्यान होगा न! हमें सभी रिश्तेदारो-मित्रों के पते भी याद होते थे. जिधर निकल लिए, प्रेम से प्रेमालाप कर लिया!”
”मुझे तो बड़ा मजेदार किस्सा याद आ रहा है. मैं मामा जी से मिलने उनके शहर गया, पर उनका बदला हुआ पता तो मुझे मालूम ही नहीं था. जैसे ही रेलवे स्टेशन से बाहर निकला, मुझे मामा जी का स्कूटर खड़ा दिखा. मुझे नंबर याद था, मैं उसके पास खड़ा हो गया. थोड़ी देर बाद मामा जी स्कूटर लेने आए और मुझे भी साथ में ले गए. यही तो है याददाश्त का जादू!”
”अरे भाई, मुख्य मुद्दा तो रह ही गया, इनाम के लिए किस चित्र का चुनाव करना है!”
”यही सी-सॉ वाला चित्र! यह संदेश देता है, बल भी लाभकारी है और ज्ञान भी. पुराने समय के किताबी ज्ञान का भी अपना महत्त्व है और नयी तकनीक वाले भ्रमणभाष की भी अपनी महता है. जरूरत है दोनों में संतुलन बनाए रखने की!”
”तभी तो चित्रकार ने इस चित्र को ‘संतुलन’ शीर्षक से विभूषित किया है.”
संतुलन ने बाजी मार ली थी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “संतुलन

  • लीला तिवानी

    जीवन में हर जगह हर पल संतुलन की आवश्यकता है, कहीं बल से काम होता है कहीं बुद्धि-ज्ञान से. देश में भी संतुलत की अत्यंत आवश्यकता है. सुख-दुःख, अंधियारा-उजाला, दिन-रात भी हमें हर समय संतुलन की ही महिमा बताते रहते हैं.

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