अंधविश्वास की जड़ें

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया. इस एक मामले में पत्नी किसी तांत्रिक के कहने पर अपने पति को खाने के लिए सिर्फ लड्डू दे रही है, वह भी सुबह चार और शाम चार बजे से पहले. इसे लेकर पति परेशान है और पति-पत्नी के रिश्तों में दरार आ गई है. पति ने परामर्श केंद्र में शिकायत की. परामर्श केंद्र ने खड़े किए हाथ, कहा- ”अंधविश्वास का इलाज नहीं.” असल में कुछ दिनों पहले अचानक पति की तबीयत खराब हो गई. इलाज से फायदा नहीं हुआ तो महिला किसी तांत्रिक के पास चली गई. तांत्रिक ने पति को सिर्फ लड्डू खिलाने की सलाह दी. वह भी सुबह चार और शाम चार बजे से पहले.
इस ताजा मामले ने हमें 25 साल पहले की याद ताजा करा दी.
”मैडम मैं तो लुट गया.” एक दिन एक मातहत ऑफिस में आकर अपने बॉस के सामने रोने लगे.
बॉस ने घंटी बजाकर चपरासी को उनके लिए पानी लाने को कहा और सहानुभूति जताते हुए पूरी बात बताने के लिए कहा.
”सर, मैं कल बैंक से पैसे निकलवाने के लिए गया, तो बैंक वालों ने सारा अकाउंट खाली करवाने की बात कही.”
”वो कैसे हुआ? आपको पता नहीं चला?”
”यह तो कुछ भी नहीं सर, मेरा घर भी गिरवी रख दिया गया है और मुझे उसके 20 लाख जल्दी अदा करने का तगादा आ रहा है, अन्यथा भारी ब्याज की धमकी मिल रही है.”
”बड़े अफसोस की बात है, लेकिन आपको बिना पता लगे इतना सब कुछ हो कैसे गया!” बॉस खुद हैरान थे.
”सर, इनकी पत्नी एक अपने इलाज के लिए तांत्रिक से मिलती थीं. वे तांत्रिक के सम्मोहन से सम्मोहित हो गई थीं. तांत्रिक धीरे-धीरे इनका अकाउंट खोखला करता गया, अब तो इनकी पत्नी को लेकर फरार भी हो गया है.” एक और कर्मचारी ने प्रवेश करते हुए हुए बताया.
”मामला तो बहुत पेचीदा हो गया है. इसका समाधान निकलना बहुत मुश्किल है, फिर भी हमसे जो मदद बन पड़ेगी अवश्य करेंगे. मिस्टर गोयल, आप इनको ले जाइए और थोड़ा साहस बंधाइए.” बॉस ने मिस्टर गोयल को संबोधित करते कहा.
”जी सर, घर के भेदी ने ही सेंधमारी की है. तांत्रिक और अंधविश्वास ले डूबते हैं.”
”अंधविश्वास की जड़ें आज भी गहराई हुई हैं.” हर सुनने वाला सोच रहा था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।