कथा

”आंटीजी, आपने तो मेरी व्यथा को कथा में बदल दिया.” आज कमलेश ने फोन पर कहा था.
”वो कैसे भला?” आंटी का सहज-सा सवाल था.
”उस दिन आपसे मिलने के बाद मैं बहुत खुश रहने लगी हूं. पतिदेव और बच्चों ने भी इस बात पर ग़ौर किया और उसका कारण पूछा.”
”फिर, आपने क्या बताया?”
”नताशा आंटी ने मेरी व्यथा को कथा में बदल दिया. मैंने उनको बताया, कि मेरा मन उलझा-उलझा रहता है, ऐन टाइम पर कीर्तन पर आने का, किसी से मिलने का मन ही नहीं करता. आंटी ने अनेक सच्चे किस्से सुनाकर मेरे मन को निर्मल कर दिया. आंटी ने कहा- ‘मन को नियंत्रण में करना तो तुम्हारे अपने ही बस में है.’ मैंने कहा था,
”फिर मन नियंत्रण में हो गया?”
”जी आंटीजी, आपकी एक बात मेरे मन में घर कर गई है. किसी के ताने-तुनकों और दुःखद किस्सों को मन से निकाल फेंको. इतना याद रखो, कि इस दुनिया में नीचे गिराने वाले लोग तो थोक के भाव मिल जाएंगे, पर ऊपर उठाने वाला विरला ही मिलेगा. आंटीजी, बस यही गुर मेरे काम आया और मेरी व्यथा कथा में बदल गई. अब ताने-तुनके और दुःखद किस्से मुझे नहीं उलझाते, बल्कि मुझे जीने का संबल देते हैं. सभी व्यथाएं बीते समय की कथाएं बन गई हैं. आंटीजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. कृपया आज आप मंगलवार के कीर्तन में अवश्य आइएगा.”
”ऐसा ही संबल हम सबको सहारा दे सके तो कितना अच्छा हो!” आंटी ने अपने अंतर्मन को समझाया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।