दरवेश

सोशल मीडिया भले ही कितनी भी लाभदायक क्यों न हो, पर मेरठ के एक युवक तालिब को यह बहुत महंगा पड़ा.

यूपी के मेरठ के एक युवक के बारे में सोशल मीडिया पर मेसेज वायरल हो रहा था कि उसकी मौत पबजी गेम खेलते वक्त हो गई है. इस युवक को थाने में आकर कहना पड़ा कि ‘मैं जिंदा हूं’.

दिल्ली-निवासी दरवेश को यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ‘मैं जिंदा हूं’. उसकी व्हील चेयर की मोबाइल शॉप खुद ही बता देती है, कि दरवेश जिंदा है और हौसले से जिंदा है.

असल में लकवे के कारण दरवेश के शरीर का निचला हिस्सा काम करने में अशक्त हो गया है, लेकिन उसका जज़्बा अशक्त नहीं हुआ, इसलिए अपनी व्हील चेयर पर जरूरी बदलाव करके दरवेश ब्रेड, टॉफी, चॉकलेट आदि बेचते हैं. बड़ी ब्रैंड की गाड़ियों के साइरन की तरह दरवेश की व्हील चेयर की घंटी सुनकर बच्चे उन्हें घेर लेते हैं.

”बाबाजी, आपको गर्मी नहीं लगती, इतनी धूप में भी छाता नहीं खोला है?” बच्चे पूछते.

”बेटा, धूप से मुझे डर नहीं लगता. धूप से विटामिन डी मिलता है यह तो सभी जानते हैं, अब एक नई शोध में कहा गया है- ”धूप में टहलने से डाइबिटीज़ का डर नहीं रहता, क्योंकि डाइबिटीज़ होने में विटामिन डी की कमी का भी हाथ हो सकता है. बारिश में सामान भीगने न पाए, इसलिए मेरा बड़ा-सा फोल्डिंग छाता एक बटन दबाते ही खुल जाता है.”

”बाबाजी, आपका नाम दरवेश है या कुछ और?” कोई पूछता.

”बेटा, अपना असली नाम तो मैं कहीं बहुत पीछे छोड़ आया हूं. मेरे भारी-भरकम शरीर और गेरुए कपड़ों के कारण मुझे किसी ने दरवेश नाम दे दिया, बस तभी से मैं दरवेश के नाम से पुकारा जाने लगा. बच्चों के लिए तो मैं अब भी बाबाजी हूं. कुछ लोग मेरी शांत मुद्रा के कारण भी मुझे दरवेश कहते हैं.”

तभी बच्चों की एक और टोली ने बाबाजी को घेर लिया. दरवेश का साहस फिर नई ऊर्जा से ऊर्जित हो गया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।