यादों के झरोखे से-9

शिक्षक दिवस 5 सितंबर पर विशेष

                              शिक्षक विश्वासरूपेण संस्थिताः

September 5, 2016, 11:30 AM IST  in रसलीला | देश-दुनिया

आज हम भारत में शिक्षक दिवस मना रहे हैं. चलिए पहले बीते कल की बात कर लेते हैं. कल तारीख थी- 4 / 9 / 16. यह तारीख गणित की दृष्टि से विशेष थी-

4 / 9 / 16
2² / 3² / 4²

ऐसी मज़ेदार और डिजिटल चीज़ें और वे तमाम बातें, जो हम लिखते-पढ़ते-बोलते-करते हैं, हमें हमारे शिक्षकों ने सिखाई हैं. आम तौर पर शाब्दिक और अकादमिक शिक्षा देनेवाले को शिक्षक कहा जाता है, आध्यात्मिक शिक्षा देनेवाले को गुरु और खेल की शिक्षा देनेवाले को कोच कहा जाता है, यानी शिक्षा का अर्थ है सीखना और शिक्षक का अर्थ है सिखाने वाला. शिक्षक से पूर्णरूपेण शिक्षा प्राप्त करने के लिए विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है. विश्वास हो तो हम कभी भी, कहीं भी, किसी से भी शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं. इसी विश्वास के साथ सभी शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हुए हम शिक्षक दिवस के बारे में कुछ बात कर रहे हैं.

 

शिक्षक का काम है ज्ञान को एकत्र करना या प्राप्त करना और फिर उसे बांटना. शिक्षक ज्ञान का दीपक बनकर चारों तरफ अपना प्रकाश विकीर्ण करते हैं. आप जानते ही हैं, कि हम भारत में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाते हैं. 5 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है. डॉ. राधाकृष्णन पहले उप-राष्ट्रपति थे और फिर देश के राष्ट्रपति बने, लेकिन उससे भी डॉ. राधाकृष्णन शिक्षक थे. उनका मानना था कि एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान है.

 

डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओं, आनंददायी अभिव्यक्ति और हंसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे. वे छात्रों को प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें. वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे. दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे.

 

आज हम कुछ शिक्षकों की बात करेंगे. सबसे पहले हम सिडनी में अपनी वर्तमान शिक्षिका Margie की बात करते हैं. Margie हमें वीरवार के दिन सुबह 10-12 तक दो घंटे English Conversational Class में पढ़ाती हैं, जो कि अवैतनिक स्कूल है. Margie हमें पढ़ाने से स्वयं उस विषय का अच्छा अध्ययन करके आती हैं. पिछले महीने जब रियो में ओलिंपिक गेम्स चल रहे थे, तो Margie ने हमें ओलिंपिक गेम्स के विभिन्न गेम्स के बारे में बताया था. पहले लैक्चर में 28 में से 16 गेम्स के बारे में विस्तार से बताया और हर गेम का Action करके दिखाया. जब उसने हमें कूद में लंगड़ी कूद करके दिखाई, तो मुझे एक पल को हैरानी हुई, कि इतनी उम्र में यह इतनी आसानी से कैसे कर पा रही हैं. फिर मन ने जवाब दिया, ”जो रोज़ नियम से दो घंटे बैडमिंटन, गोल्फ और बास्केट बॉल खेलती हो, उसके लिए यह क्या मुश्किल है?”

 

थोड़ी देर बाद हम छात्रों की Action की बारी आई. मैंने अपने भारत देश के स्टापू खेल का Action किया, जिसमें लंगड़ी कूद भी करनी होती है. शिक्षिका की नज़र में तो मैं पास हो गई और Clapping की हकदार हो गई, लेकिन मुझे लगा, कि मैं भी Margie की ही उम्र की हूं, लेकिन मैं उतनी अच्छी तरह लंगड़ी कूद नहीं कर पाई, जैसे Margie ने की थी, जब कि कुछ साल पहले मैं भी अपनी छात्राओं के साथ लंगड़ी कूद, स्टापू और बैडमिंटन खेलती थी. घर आकर मैंने कोशिश की और तब से बराबर रोज़ कर रही हूं, अब एक महीने के अभ्यास से मुझमें इतना विश्वास आ गया है, कि कोई मुझे लंगड़ी कूद या स्टापू खेलने को कहेगा, तो मैं उसकी चुनौती स्वीकार कर सकती हूं. यह सब गुरु के प्रति विश्वास और मेरे दृढ़ संकल्प से ही संभव हो पाया है.

 

अब बात भारत की करते हैं. सुबह उठते ही नभाटा की Headline दिखी- ”शिक्षक का ट्रांसफर हुआ तो रो पड़ा पूरा गांव”. मन-ही-मन ऐसे श्रद्धेय शिक्षक को नमन करते हुए पूरा समाचार पढ़ा, जिसका सार था- ”हरबंशपुर उच्च प्राथमिक स्कूल से एक शिक्षक का उसके गृह जिले बस्ती में ट्रांसफर हुआ, तो शिक्षक के साथ ही बच्चे और पूरा गांव रो पड़ा. मूलरूप से बस्ती के रहने वाले हरीश कुमार वर्ष 2009 में श्रावस्ती के गिलौला ब्लॉक के हरिबंशपुर में सहायक अध्यापक के पद पर तैनात हुए थे. पिछले सात साल में उन्होंने बच्चों के साथ ही पूरे गांव को भी अपना मुरीद बना लिया था. इस बात का उन्हें पता था कि लोग उन्हें चाहते हैं, लेकिन उनकी विदाई पर पूरा गांव रो पड़ेगा, उन्हें इसका अहसास गुरुवार को ही हुआ.” सात साल में उन्होंने छात्रों के साथ पूरे गांव का विश्वास हासिल कर लिया था.

 

विश्वास का ही साक्षात प्रमाण रियो ओलिंपिक्स में मिला. विमिंज फ्री-स्टाइल रेसलिंग की 58 किग्रा वेट कैटिगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली रोहतक की साक्षी मलिक के शब्दों में देखिए-”उस मेडल-विनिंग मैच में मेरे पास आखिर में कमबैक करने के लिए वक्त था. मैंने तो 2-2 सेकंड में कुश्ती का रिजल्ट बदलते हुए देखा है, तो मुझे अपनी क्षमताओं पर इतना भरोसा था कि मौका मिलते ही मैं पासा पलट दूंगी. इस भरोसे को मेरे कोच कुलदीप सर ने भी मैच के दरम्यान बहुत ऊंचा रखा. वह बार-बार कहते रहे कि तू कर सकती है. जब मैंने कर दिया, उसके बाद से तो मेरी जिंदगी ही बदल गई है.गुरु ने उत्साह बढ़ाया और मैं आखिरी 10 सेकिंड में जीत गई.”

 

रियो ओलिंपिक्स में सिंधु को सिल्वर सिंधु बनाने का श्रेय उनके गुरु पुलेला गोपीचंद के विश्वास को ही जाता है. रियो ओलिंपिक्स से वापिस आने पर सिल्वर सिंधु और उनके गुरु पुलेला गोपीचंद का भव्य सम्मान किस तरह हुआ था, यह तो आप देख-सुन ही चुके हैं. सिंधु को ढेरों पुरस्कार तो मिले ही, तेलंगाना सरकार ने सिंधु के कोच गोपीचंद को भी एक करोड़ रुपये का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की है. यह शिक्षक और उनके विश्वास का सम्मान है. साइना नेहवाल और पीवी सिंधु जैसी ओलिंपिक मेडल विजेता खिलाड़ियों को कोचिंग देने वाले पुलेला गोपीचंद का कहना है कि वह खुद को लकी मानते हैं कि वह पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं थे. खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए देश भर में चर्चित हुए गोपीचंद ने कहा कि आईआईटी की परीक्षा में असफल होने के बाद उनकी राह बदल गई और वह सफल स्पोर्ट्स-पर्सन बन सके.

 

गुरु की महिमा अनंत है, फिर भी ब्लॉग के समापन हेतु अंत में हम यह कहना चाहेंगे, कि गुरु अविश्वास रूपी अंधकार को हटाकर विश्वास रूपी सूर्य के जाज्वल्यमान प्रकाश को प्रकाशित करता है और शिष्य या छात्र के दामन को सफलता के मोतियों से भरता है. इति शिक्षक विश्वासरूपेण संस्थिताः. एक बार फिर सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

पुनश्च
आजकल गणेशोत्सव चल रहा है. गणाधिपति गणराज गणेश के पूजन का दस दिन का उत्सव प्रारम्भ हो गया है. विघ्नहर्त्ता गणेश जी को कोटिशः नमन करते हुए सभी को गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।