रोड शो-4: बात हिंदी की शुद्ध वर्तनी और अन्य पहलुओं की

हिंदी दिवस 14 सितंबर पर विशेष

”रोड शो का अर्थ है डंके की चोट पर जगना-जगाना. क्या हम-आप तैयार जगने-जगाने के लिए?”

”जी, बिलकुल. इसीलिए तो हमें यह शानदार मंच मिला है.”

तो आइए देखते हैं इस बार इस रोड में क्या हो रहा है? ये सब केवल बातें ही नहीं हैं, बल्कि ज्ञानवर्द्धन और उपयोगी भी हैं और बहुत कुछ सोचने-समझने के लिए भी. सबसे पहले ‘रोड शो-4: बात रोमांचक किस्सों की से’ में आई हमारे एक पाठक-कामेंटेटर रविंदर सूदन की शानदार-जानदार प्रतिक्रिया आई थी, जो हिंदी से ही संबंधित है. उनकी प्रतिक्रिया इस प्रकार है-

”मध्यप्रदेश के भोपाल से करीब ढ़ाई सौ किलोमीटर दूर धार जिला ही राजा भोज की “धारानगरी” है.बहुमुखी प्रतिभा के धनी राजा भोज शस्त्रों के ही नहीं बल्कि शास्त्रों के भी ज्ञाता थे. उन्होंने वास्तुशास्त्र, व्याकरण, आयुर्वेद, योग, साहित्य और धर्म पर कई ग्रंथ और टीकाएँ लिखी. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को एक जमाने में “भोजपाल” कहा जाता था और बाद में इसका “ज” गायब होकर ही इसका नाम “भोपाल” पड़ गया. राजा भोज ने भोजशाला तो बनाई ही मगर वो आज भी जन-जन में जाने जाते हैं एक कहावत के रूप में- “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“. किन्तु इस कहावत में गंगू तेली नहीं अपितु “गांगेय तैलंग” हैं. गंगू अर्थात् गांगेय कलचुरि नरेश और तेली अर्थात् चालुका नरेश तैलय दोनों मिलकर भी राजा भोज को नहीं हरा पाए थे. ये दक्षिण के राजा थे, और इन्होंने धार नगरी पर आक्रमण किया था मगर मुंह की खानी पड़ी तो धार के लोगों ने ही हंसी उड़ाई कि “कहां राजा भोज कहां गांगेय तैलंग”. गांगेय तैलंग का ही विकृत रूप है गंगू तेली”, जो आज “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली“ रूप में प्रसिद्ध है.”
रविंदर सूदन

 

रविंदर भाई की यह बात मुख-सुख या प्रयत्न लाघव के कारण होती है. जैसे हम आप मैडम को मैम और डैडी को डैड बना देते हैं.

शुद्ध वर्तनी की बात करते हुए हम आपसे पहले ही क्षमायाचना करना चाहते हैं. हम इंसान हैं और जाने-अनजाने त्रुटियां अक्सर हमसे होती ही रहती हैं, फिर भी उसमें सुधार का प्रयास करना आवश्यक है. रोड शो का यह अंक उसी प्रयास की एक कोशिश है, इसलिए आप अन्यथा न लें और यथासम्भव अपनी त्रुटियों में सुधार कर लें.

जब हम बात हिंदी की शुद्ध वर्तनी की करते हैं, तो सबसे पहले हमारे समक्ष यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, कि हिंदी भाषा-भाषी देश में रहते हुए भी हमें हिंदी की शुद्ध वर्तनी की बात क्यों करनी पड़ रही है?

शुद्ध वर्तनी की बहुत-सी बातें तो आपको हमारे एक आलेख- ”हिंदी वर्तनी की सामान्य अशुद्धियां” में मिल जाएंगी. आप लोग जानते ही हैं, कि इस शोध पर हमको राज्य स्तर के पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है. यहां हम केवल उन्हीं अशुद्धियों की बात करेंगे, जो हमें ब्लॉग्स में, प्रतिक्रियाओं में, ब्लॉग्स के लिए भेजी गई कविताओं में अक्सर नजर आती हैं.

1.में-

अक्सर ‘में’ को मे लिखा जाता है. ऐसा समझ लिया जाता है, कि म को बिंदी की आवश्यकता ही नहीं है. सही शब्द ‘में’ होता है. इसी तरह ‘मैं’ में भी बिंदी लगती है.

2.कि और की-

कि और की में बहुत-से लोग अंतर नहीं कर पाते, जब कि इनका गणित बहुत सरल है. ‘कि’ वहां आता है, जहां हम दो वाक्यों को जोड़ते हैं. जैसे-
”उसने कहा कि वह आज नहीं आएगा.”
की संज्ञा या सर्वनाम के साथ लगता है. जैसे-
”भाषा की बात करें, सुरेश की बात करें आदि.”

3.योजक चिह्न-

आजकल अक्सर योजक चिह्न (-) को विलुप्त कर दिया जाता है. वास्तव में योजक चिह्न कई काम करता है-
पहला- युग्म शब्दों में. जैसे- माता-पिता, भाई-बहिन, दिन-रात आदि. यहां योजक चिह्न ‘और’ शब्द का काम करता है.
दूसरा- योजक चिह्न उन शब्दों में भी लगता है, जो एक साथ बोले जाते हैं. जैसे- साथ-साथ, रू-ब-रू आदि.
तीसरा- इसी तरह सा, जैसा आदि से पूर्व हाइफ़न रखा जाए. जैसे :– तुम-सा, राम-जैसा, चाकू-से तीखे. इसे हम उपमा अलंकार भी कहते हैं.
चौथा- तत्पुरुष समास में हाइफ़न का प्रयोग केवल वहीं किया जाए जहाँ उसके बिना भ्रम होने की संभावना हो, अन्यथा नहीं। जैसे :– भू-तत्व. सामान्यत: तत्पुरुष समास में हाइफ़न लगाने की आवश्यकता नहीं है. जैसे :– रामराज्य, राजकुमार, गंगाजल, ग्रामवासी, आत्महत्या आदि.

4.पूर्ण विराम और अर्द्ध विराम के बाद स्पेस-

पूर्ण विराम और अर्द्ध विराम के बाद जो स्पेस दिया जाता है, उसमें भी त्रुटि दिखाई दे रही है. एक वाक्य समाप्त होने के बाद पूर्ण विराम तुरंत लगाना चाहिए, एक स्पेस देकर फिर अगला वाक्य शुरु करना चाहिए. इसी तरह अनेक शब्दों के मेल के लिए अर्द्ध विराम का प्रयोग भी इसी तरह करना चाहिए. जैसे- राम, श्याम, मोहन और रमेश आज स्कूल नहीं आए.
इन दोनों विरामों में स्पेस विराम के बाद दिया जाता है, पहले नहीं.

5.पूर्वकालिक कृदंत प्रत्‍यय ‘कर’ का प्रयोग-
पूर्वकालिक कृदंत प्रत्यय ‘कर’ क्रिया से मिलाकर लिखा जाए। जैसे :– मिलाकर, खा-पीकर, रो-रोकर आदि. इसको ऐसे भी याद रखा जा सकता है, कि दो क्रियां एक साथ हों तो पहली क्रिया के साथ योजक चिह्न लगेगा, दूसरी क्रिया के साथ कर लगेगा. जैसे- खा-पीकर सो जाना. बार-बार वहां आ-जाकर हम थक गए हैं.

6.वाला
क्रिया रुपों में ‘करने वाला’ ‘आने वाला’ ‘बोलने वाला’ आदि को अलग लिखा जाए. जैसे: – मैं घर जाने वाला हूँ जाने वाले लोग.
योजक प्रत्यय के रूप में ‘घरवाला’ ‘टोपीवाला’ , ‘दिलवाला’, दूधवाला आदि एक शब्द के समान ही लिखे जाएँगे.
‘वाला’ जब प्रत्यय के रूप में आएगा तब तो नियम 2 के अनुसार मिलाकर लिखा जाएगा, अन्यथा अलग से. यह वाला, यह वाली, पहले वाला, अच्छा वाला, लाल वाला, कल वाली, बात आदि में वाला निर्देशक शब्द है, अत: इसे अलग ही लिखा जाए.
इसी तरह लंबे बालों वाली लड़की, दाढ़ी वाला आदमी आदि शब्दों में भी वाला अलग लिखा जाएगा. इससे हम रचना के स्तर पर अंतर कर सकते हैं. जैसे- गाँववाला, गाँव वाला मकान.

7.श्रुतिमूलक ‘य’, ‘व’-
जहाँ श्रुतिमूलक य, व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया जाए, अर्थात् किए: किये, नई: नयी, हुआ: हुवा आदि में से पहले (स्वरात्मक) रुपों का प्रयोग किया जाए. यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय आदि सभी रुपों और स्थितियों में लागू माना जाए. जैसे:- दिखाए गए, राम के लिए, पुस्तक लिये हुए, नई दिल्ली आदि.
जहाँ ‘य’ श्रुतिमूलक व्याकरणिक परिवर्तन न होकर शब्द का ही मूल तत्त्व हो वहाँ वैकल्पिक श्रुतिमूलक स्वरात्मक परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है. जैसे:- स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि (अर्थात् यहाँ स्थाई, अव्यईभाव, दाइत्व नहीं लिखा जाएगा).

8.ड़ और ढ़-
अक्सर ड़ और ढ़ के नीचे की बिंदु को नजरअंदाज कर दिया जाता है. ऐसे करने से लड़की, लड़का को लडकी-लडका लिखा जाता है और बढ़िया को बढिया. ऐसी ही बहुत-सी बातें आप कामेंट्स में पढ़ेंगे.

एक शंका व समाधान-
हिंदी में कन्फर्म के बदले निश्चित रूप से का प्रयोग होना चाहिए. आपके जेहन में कोई और शब्द आ रहा है? एक समाचार के आधार पर- ”एक समाचार में कन्फर्म का प्रयोग किया गया था, बड़ा अजीब लगा.”

इसका दूसरा शब्द है पुष्टि, लेकिन इसके लिए सिर्फ़ ‘पुष्टि’ शब्द से काम नहीं चलेगा. हमें कहना पड़ेगा- पुष्टि की गई है आदि. इसलिए अंग्रेजी का ‘कन्फर्म’ शब्द स्वीकार कर लेना उचित है. वैसे भी हमारी हिंदी भाषा संस्कृत के अतिरिक्त अनेक विदेशी भाषाओं (अंग्रेजे, उर्दू, पुर्तगाली आदि) के शब्दों को अपने में समाविष्ट करके समृद्ध बन गई है.

आज के लिए बस इतना ही. शेष फिर कभी.

हिंदी वर्तनी की सामान्य अशुद्धियां

हिंदी वर्तनी की सामान्य अशुद्धियां

हिंदी वर्तनी की सामान्य अशुद्धियां आलेख को पढ़ना मत भूलिएगा. यह आलेख आपके लिए बहुत ज्ञानवर्द्धक और उपयोगी है.

आप सबको हिंदी दिवस की कोटिशः शुभकामनाएं.


 

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।