कविता

मन निर्मल

प्रथम वर्षा पर
बहुत गंदा था पानी
कचरा – मिट्टी  , गंदगी समेटे
बिल्कुल भूरे रंग में ।
बह रहा था
पर  , धीरे – धीरे
प्रतिपल , प्रतिदिन
छनता गया पानी
और निर्मल हो गया
एकदम पारदर्शी ।
इसी तरह जीवन में
जब होती है , सद्विचारों की वर्षा
तन – मन निर्मल होकर ,
हो जाता है पारदर्शी
एकदम पवित्र जल  – सा
और पसंद किया जाता है
हर प्राणी द्वारा जल – सा जलसा ।

रवि रश्मि ‘अनुभूति’