सामाजिक

मातृ भाषाएँ व आध्यात्मिक प्रबंधन!

तत्व रूप में हिन्दी व अन्य सभी मातृ भाषाएँ भारत की ही नहीं विश्व भर की सम्पत्ति, धरोहर व अमानत हैं!

जैसे धर्म हर मानव व जीव में प्रतिष्ठित है पर वह हर किसी को प्रतिष्ठित हुआ परिलक्षित नहीं होता, वैसे ही हिन्दी व अन्य सभी मातृ भाषाएँ जन मानस के हृदय की भाषा हैं पर उनको अपने अन्दर बिठा, उपयोगित व प्रचारित कर उजागर करना है।

हम सब जिस दिन अपनी भाषाओं को मन प्राण में स्वीकार कर अपनाएँगे, सारा भारत व विश्व शीघ्र ही उन्हें अपना लेगा! बिना उसके मानवता प्रफुल्लित, पुलकित व पल्लवित नहीं हो पाएगी।

निकट भविष्य में हमारी मातृ भाषाएँ एक आवश्यकता बन जाएगी! जो उन्हें नहीं अपनाएँगे, सीखेंगे, जानेंगे व प्रयोग में लाएँगे वे जीवन की लय समझने, स्वास्थ्य लाभ करने व आध्यात्मिक उन्नति करने में अपने आप को पंगु पाएँगे!

इसी प्रकार हम सबको भारत व विश्व की हर भाषा को भी प्रतिष्ठित व उन्नत करना होगा! हर भाषा अपने आप में एक तरंग, गंग, उमंग व आनन्द की संवाहक है और हमें अधिक से अधिक भाषाएँ सीख कर व समझकर उनके अन्दर छिपे साहित्य, सुयोग, संसोग, संस्कृति व भाव सरिता को उर में समाहित कर स्वयं को व विश्व को बेहतर समझना आवश्यक होगा। बिना इसके सृष्टि में समरसता व सहयोगिता नहीं आ पाएगी!

धीरे धीरे फोन, कम्प्यूटर, आदि पर हम सब अपनी भाषाएँ लिखने में अभ्यस्त होते जा रहे हैं। विविध ऐप्स के ज़रिये हम किसी भी भाषा का अनुवाद किसी भी अन्य भाषा में कर पा रहे हैं। बोल कर लिख पा रहे हैं। साहित्य एक एक व्यक्ति द्वारा भी अनेक भाषाओं में लिखा जाने व अनुवाद किया जाने लगा है।

आज काव्य व आलेख लेखन, चित्र, चलचित्र, संगीत, पुस्तक व ई -पुस्तक प्रकाशन, पत्रिकाएँ, समाचार पत्र, पत्रकारिता, विज्ञान, जीव विज्ञान, स्वास्थ्य, चिकित्सा, आयुर्वेद, राजनीति, आदि अनेक व्यवसाय बन गये हैं।

बहुत सी नई सम्भावनाएँ प्रति दिन जन्म ले रहीं हैं व जीविका, जीने, समझने व आनन्द लेने के रास्ते खुल रहे हैं। भाषाओं की वैचित्रता विकास की आकाश-गंगा विश्व में फैला दी है जहाँ हर पल अनन्त तारे व तारिकाएँ अठखेलियाँ कर रहे हैं!

सभी भाषाओं के साथ ही साथ, सब भाषाओं की सनातन जननी संस्कृत भी अपना गरिमापूर्ण उचित स्थान ग्रहण कर रही है व अपने विश्व स्वरूप में अवतरित होगी! विज्ञान व तकनीकी शास्त्र साहित्य, गायन, आदि के साथ कम्प्यूटर, खगोलशास्त्र, ग्रह विचरण, इत्यादि में निकट भविष्य में नये आयाम संस्कृत के प्रयोग से ही सम्भव होंगे!

भाषाओं व साधना के सशक्त माध्यमों से शीघ्र ही मानव सृष्टि में सभी तरंगित व झँकृत विधाओं, कलाओं, ज्ञान, विज्ञान, योग, तंत्र, ध्यान, सृष्टि प्रबंधन, इत्यादि में नये आयाम छुएगा व सभी प्राणियों से सम्बंध व सौहार्द बना सृष्टा के कार्य में सहयोग करेगा!

✍ गोपाल बघेल ‘मधु’

१४ सितम्बर, २०१९
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा