सोने पर सुहागा (पत्रात्मक लघुकथा)

संवेदना और संप्रेषण के नायक सुदर्शन,
नमस्कार,
आपकी धारदार-पैनी कलम से हमारे ब्लॉग ‘जन्मदिन का प्यार, लाया आपके लिए एक उपहार’ पर आई पूरे ब्लॉग जैसी प्रतिक्रिया ने एक तो हमें हमारे जन्मदिन के ख़ास होने का अहसास दिलाया, दूसरे बचपन से लेकर अब तक की अनेक ऐसी महान हस्तियों से पुनः रू-ब-रू करवा दिया, जो हमारी प्रेरणा के नायक रहे. आपकी जिज्ञासाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी ही कुछ महान हस्तियों से हम आपकी संक्षिप्त मुलाकात करवा रहे हैं.

सबसे पहले हम अपने पूजनीय पिताजी का उल्लेख करना चाहेंगे. 80 साल की आयु में वे आखिरी दिन साइकिल पर कई घंटों तक अपने बिजनेस का काम करके, पूरे साल के राशन का ऑर्डर देकर, सब्जियां लेकर घर आए, खाना खाकर आटा पिसवा लाए, फिर बगीचे को पानी देने लगे. यह उनका आखिरी काम था. सरलता, सादगी, परोपकारिता, आज का काम अभी कर लेने आदि अनेक सुसंस्कारों के अतिरिक्त उनकी विशेष विरासत में हमें मिला काम की वरीयता, सुनियोजितता और समय संयोजन का सबक. उनका कहना था- ”कोई भी काम मुश्किल नहीं होता, जिस काम को पहले करना आवश्यक हो उसे वरीयता दो, काम को शुरु करने से पहले उसकी सुनियोजितता पर तनिक विचार करो और अपने एवं दूसरों के समय की कद्र करो. काम को पूजा समझने वाले हमारे पिताजी के विचार से सिरदर्द का अस्तित्व ही नहीं होता, एक काम से थक गए हो तो काम बदल लो, ताजातरीन हो जाओगे.”

 

सौभाग्यवश तिवानी साहब भी इन्हीं विचारों के हैं, इसलिए यह सिलसिला विवाह के पश्चात भी जारी रहा. बस इन्हीं विचारों से हमारा काम सरल होता चला जाता है. आपने तिवानी साहब की सरलता, सादगी और समय की पाबंदी तो देख ही ली है. मेट्रो से हम यात्रा इसलिए करते हैं, कि जब हमें सरकार ने प्रदूषण और ट्रैफिक जैम से मुक्त त्वरित साधन की सुविधा दी है, तो हमें उसका उपयोग अवश्य करना चाहिए और मेट्रो को घाटे में जाने से बचाने के लिए छोटा-सा डोनेशन देना चाहिए.

हमारी माताजी के बचपन के समय सिंध में लड़कियों को पर्दे में रखने और पढ़ने की इजाजत न होने के चलते घर-गृह्स्थी को पूर्ण समर्पित, सिलाई-कढ़ाई आदि हर काम में निपुण हमारी माताजी भले ही शिक्षा से वंचित रहीं, पर धोबी का हिसाब रखने लायक अरबी लिपि में सिंधी भाषा उन्होंने सीख ली थी, अपना बिजनेस चलाने के लिए काम-चलाऊ इंग्लिश भी सीख ली थी, अनेक भाषाएं सीखने की प्रेरणा हमें उनसे मिली. पुनः आदेश बिंदु (लघुकथा) में वर्णित मैनेजमेंट का प्रमुख गुर ‘पुनः आदेश बिंदु’ भी हमें हमारी माताजी से ही विरासत में मिला.

बचपन से ही समाज-सेवा को समर्पित सखी-सहेलियों का मिलना, आदर्श शिक्षक-शिक्षिकाओं का मिलना, अध्यापन काल में सही मार्गदर्शन देने वाली प्रधानाचार्याओं का मिलना, अच्छे पड़ोसियों का मिलना, नेट पर पूर्ण समर्पित पाठकों का मिलना आदि हमारा सौभाग्य रहा.

अपने बच्चों को हम कैसे भूल सकते हैं! बचपन में हमने उन्हें बहुत कुछ सिखाया, आज वो हमें नई तकनीक के साथ अच्छी बातों को याद रखने और आहत करने वाली बातों को भूलकर बिंदास रहने की सीख के साथ बहुत कुछ सिखाते हैं.

आपने मंदिर में भजन की बात भी कही है. आपके मंदिर की सुंदरकांड-पार्टी इतनी अच्छी और सुरीली थी, कि 4 के बजाय 5 घंटे लगातार गाती-बजाती रही, भक्तिरस से सराबोर करती रही. उसके बाद आदरणीय सुकेश जी के एक छोटा-सा भजन गाने के अनुरोध को हमने तुरंत स्वीकार कर लिया. तुरंत इसलिए कि वैसे भी हमें ना-नुकुर करने की आदत नहीं है, फिर सुकेश जी हमारा भजन सुन चुके थे, इसलिए उन्होंने समय का अभाव होते हुए भी हमें अवसर दिया था. दूसरे पहले ही इतनी देर हो चुकी थी कि एक मिनट भी ज़ाया करना उचित नहीं था. आपके साजिंदों और संगत ने उस छोटे-से भजन पर झूम-झूमकर समां बांध दिया. यहां हम आपको बताते चलें, कि भजन गाने की कला हमारे पिताजी द्वारा ही हमें विरासत में मिली है. वे सुबह दो घंटे और शाम को दो घंटे जोर-जोर से बहुत सुर में बहुत सुरीले भजन गाते थे, जो पड़ोसियों को भी मोहित कर देते थे.

गुरमैल भाई से प्रेरणा के जिक्र के बिना तो यह कथा पूरी हो ही नहीं सकती. आप सब लोग उनकी उम्र और शारीरिक हालत से वाकिफ हैं, फिर भी उनकी लगन, मेहनत और कुछ नया सीखते-करते जाने की ललक हमें बहुत कुछ सिखा जाती है. अभी हाल ही में हमने धुन में घुन (लघुकथा) लिखी थी. यह लघुकथा उनको इतनी शिक्षाप्रद लगी, कि उन्होंने उसी दिन उसे और छोटा करके रेडियो को भेज दी. अगर वे बोल सकते, तो खुद पढ़ते.

आपने ई.बुक बनाने की बात कही. नित्य श्रीमद्भवद्गीता पढ़ने और पढ़ाने वाले हमारे पिताजी से निष्काम कर्म के संस्कार भी हमें विरासत में मिले थे. तदनुसार गुरमैल भाई का हौसलाअफ़ज़ाई करते हुए हमने बेटे से उनकी 11 पुस्तकें बनवाईं. इस दौरान हमने अपनी कोई ई.बुक नहीं बनवाई, ताकि बेटे को बहुत अधिक समय न लगाना पड़े. उसके बाद हमारी ई.बुक्स भी बनती गईं. यह हरि इच्छा थी. ”मेरा मुझमें कछु नहीं, जो कछु है सो तोर.”

आजकल आप सब विद्वतगण हमारे साथ जुड़ गए हैं, यह सोने पर सुहागा हो गया है.

‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ की मंगलकामना के साथ,

लीला तिवानी

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।