कहानी

कहानी – सिमरन

अस्पताल के बेड पर पडे हुए शेखर को देखकर सिमरन सिहर जाती हैं। कभी सोचा नहीं था कि उसे इस हाल में देखेगी। कलेजा फटने को हो गया जी हुआ चिल्ला कर रो पडे। पैर कांपने लगे लेकिन खुद को संयत कर एकदम शेखर के सामने जाकर खड़ी हो गई। अचानक सिमरन को सामने देख शेखर के चेहरे पर खुशी झलक गई।

“सिमरन तुम! मुझे पता था तुम जरूर आओगी। यकीन था मुझे।”

“और जो ना आती तो? तो क्या करते। सारे कॉलेज सारे शहर में मशहूर कर दिया मुझे। मेरे लिए आशिक बन गए। आत्महत्या करने की कोशिश? सोचा भी नहीं तुम्हारे परिवार पर क्या बीतेगी।” आँख नम हो गई उसकी, लेकिन चेहरे पर कठोरता कायम रही।

“माफ कर दे मुझे सिमरन लेकिन क्या करता मैं बर्दाश्त नही कर सका तेरी बेरूखी।”

“बेरूखी ! कैसी बेरूखी शेखर? जिंदगी में और भी जरुरी काम हैं। मैं अपने माँ पापा के सपने को पूरा करना चाहती हूँ लेकिन तुमने ! ….अब बचा ही क्या है मेरे लिए सिवाय बदनामी के? दो ही रास्ते बचें है जिंदगी में या तो आत्महत्या कर लूँ या कलंक के साथ जिंदा रहूँ।”
“पागल हो गई है तू? हुआ क्या है, जो इतना ओवर रियैक्ट कर रही हो।”
“मैं पागल हो गई हूँ मैं!”…चीखते हुए सिमरन ने कहा। “तूने मेरी जिंदगी खराब कर दी । कहीं का नहीं छोड़ा। दोस्त कहता था ना खुद को लेकिन दोस्ती के नाम पर दाग लगा दिया। बोल क्यों किया ऐसा बोल!..”
“क्योंकि प्यार करता हूँ तुझे…..बहुत प्यार.. लेकिन तू समझती ही नहीं.. उस रोहन से कुछ ज्यादा ही घुलमिल रही थी। मुझसे बर्दाश्त नही हुआ इसलिए तेरे लिए यह कहानी गड़ी।”
“पूछ तो लेता शेखर कि मैं ऐसा कुछ सोचती हूँ कि नहीं… तुझे क्या लगता है मैं तुझसे प्यार करती हूँ ? तो सुन..। हाँ तुझसे प्यार करने लगी थी लेकिन अब नफरत करती हूं….तुझ जैसे कायर इंसान से कौन प्यार करेगा… जिसने एक लड़की को बदनाम करने के लिए आत्महत्या का नाटक किया।”
“मुझे माफ कर दे सिमरन…लेकिन नफरत न कर ,मुझे माफ  कर दे ।”
“न करूंगी तो क्या करेगा ? दोबारा मरने की कोशिश करेगा! तेरे माता पिता, भाई बहन कोई नहीं है तेरा। बस मैं ही हूँ ,इसलिए तो ऐसा किया। तेरा कैरियर तेरा सपना सिर्फ मैं हूँ। जा नहीं करती माफ…।”
“मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है सिमरन। समझ आ गया मुझे। पागल ही हूँ नहीं समझ सका कि तू सिर्फ मुझे चाहती हैं लेकिन अब वादा करता हूँ पहले खुद को साबित करूंगा फिर तेरे पास आऊंगा।”
अब सिमरन शायद अपने आँसुओं को न रोक पाती और तेजी से कमरे से निकल गई। सामने शेखर की माँ थी।
”रूक सिमरन!”
“हाँ आंटी जी “
”आंटी नहीं माँ कह पगली।तेरे प्यार को कोई देखे न देखें मैने देख लिया है। बस तू इंतजार करना तबतक जबतक मेरा बेटा तेरे लायक न बन जाये। करेगी ना?”
सहमति से गरदन हिलाकर सिमरन माँ के गले लग गई।

— दिव्या राकेश शर्मा

दिव्या राकेश शर्मा

पता-गुरूग्राम हरियाणा विधा-लघुकथा, कहानी, कविता, गजल नुक्कड़ नाटक। उपलब्धि-प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का लगातार प्रकाशन, दैनिक भास्कर में साक्षात्कार प्रकाशित, जुगरनाट वेबसाइट में साक्षात्कार प्रकाशित, नुक्कड़ नाटक संस्थान द्वारा लघुकथाओं का मंचन व नुक्कड़ नाटक का मंचन। साझा काव्य संग्रह, साझा लघुकथा संग्रह प्रकाशित। किस्सा कोताह पत्रिका में बाल रचनाओं का सहसंपादन।