यादों के झरोखे से- 10

चमचे ही गायब!

May 10, 2018, 7:33 AM IST  in रसलीला | मनोरंजन

भोजन और चमचों का चोली-दामन का साथ है. भोजन सामने आ गया हो और चमचे न आएं, तो भोजन अधूरा-अधूरा लगता है. कभी-कभी तो महज बर्तन देखकर ही चिल्लाहट शुरु हो जाती है, ”भई, चमचे तो लाई ही नहीं हो!.” सब काम छोड़कर पहले टेबिल पर चमचे पहुंचाए जाते हैं. भंडारे में भी लोग घर से चमचे लेकर जाते हैं, ताकि वहां चमचे न मिलने पर परेशानी का सामना न करना पड़े.

होटल, रेस्टोरेंट और कैंटीन में तो चमचे प्रधान होते हैं. हर होटल, रेस्टोरेंट और कैंटीन के चमचे अलग तरह के होते हैं और अक्सर इन पर होटल, रेस्टोरेंट और कैंटीन का नाम भी लिखा होता है. एक सज्जन अपने घर किसी को खाने पर आमंत्रित नहीं करते थे, क्योंकि उनके पास अनेक होटल, रेस्टोरेंट और कैंटीन के चमचे थे और उनको डर था कि कोई उनको पहचान कर ले न जाए या टोक न दे.

अब देखिए न! बेंगलुरु में खोली गई एक कैंटीन से 20 लाख रुपये के प्लेट और चमचे गायब हो गए हैं. इसमें 1.2 लाख चमचे और 10,000 प्लेटों के गायब होने की जानकारी मिली है. इतनी बड़ी मात्रा में चमचे गायब होने की बात पहले कभी देखी-सुनी नहीं थी. इस स्तर पर सामान गायब होता देख, कैंटीन संचालकों ने चमचे देना ही बंद कर दिया है.

चमचे भोजन में ही नहीं राजनीति में भी सक्रिय होते पाए जाते हैं. वे दल का स्तर देखकर सदस्यता ग्रहण करते हैं, फिर गायब भी हो जाते हैं. वे कभी कुछ देर के लिए गायब हो जाते हैं, कभी लंबे समय के लिए और कभी-कभी हमेशा के लिए. इसलिए कैंटीन के गायब चमचों की गिनती की जा सकती है, राजनीति के चमचों की नहीं. वे ‘हां जी’, ‘हां जी’ के अंदाज में मुंडी हिलाते-हिलाते कब ‘ना जी’, ‘ना जी’ करते हुए दूसरे दल में जा मिलें, पता ही नहीं चलता.

चुनाव के दिनों में ये चमचे प्रधान होते हैं. भीड़ की गिनती बढ़ाने के लिए इन चमचों की अहमियत कई गुना बढ़ जाती है. वे इसके लिए मनमाने दाम और सुविधाएं भी चाहते हैं. जहां अधिक दाम और सुविधाएं देखीं, कि पाला बदलकर वहां आ गए.

ख़ैर इन चमचों की बात छोड़िए, आप कैंटीन के चमचों की सुध लीजिए. प्लेट-चमचे गायब करने वालों को यह भी बता दीजिएगा, अब वहां सिक्यॉरिटी गार्ड्स की तैनाती और सीसीटीवी लगाने का काम हो चुका है.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।