इस बार आप क्या कर रहे हैं हिंदी दिवस पर!

आज वे बहुत उत्साहित दिखाई दिये।घर में प्रवेश करते ही उन्होंने पूछा- इस बार हिंदी दिवस पर तुम क्या कर रहे हो। मैंने कहा-नहीं ,कुछ नहीं!इसके लिए क्या कुछ अलग से करना पड़ता है! वे बोले- अरे भाई, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है,उसे उसका सम्मानजनक स्थान मिले ,यह तुम्हारा-हमारा सभी का दायित्व है और इसके लिए हिंदी दिवस पर कुछ विशेष तो करना ही होगा।

लेकिन भाई साहब ,मैं तो पूरे सालभर हिंदी में ही बातचीत करता हूँ,भले ही सामने वाला अंग्रेजी में बात कर रहा हो। यहाँ तक कि जब तक सरकारी नौकरी में रहा,हिंदी में ही सभी कामकाज और पत्र-व्यवहार किया।हिंदी भाषा के अलावा अन्य किसी भाषा में काम नहीं किया ,मैंने कहा।

तपाक से वे बोले-अरे भाई, यह तो ठीक है।तुम्हें अंग्रेजी नहीं आती होगी, इसीलिए तुम हिंदी में बात करते रहे होंगे और दफ्तर में भी हिंदी में ही काम किया होगा।

नहीं ऐसा नहीं है।मेरा स्नातक स्तर पर हिंदी साहित्य के साथ अंग्रेजी साहित्य भी एक विषय था।अंग्रेजी भाषा का ज्ञान होने का यह तात्पर्य तो नहीं कि मैं अपने ही देश में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करूं।वैसे भी हिंदी भाषा में जितनी मिठास है उतनी गिटर-पिटर वाली अंग्रेजी भाषा में कहाँ! हिंदी बोलने में अपनत्व का भाव समाहित है।मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि जब भी देश के अन्य प्रांतों, यहाँ तक कि दक्षिण के प्रांतों में जाना हुआ, मुझे अंग्रेजी बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।मैंने अपनी मातृभाषा हिंदी में ही लोगों से संवाद किया।ऐसे में किसी दिन विशेष पर ही कुछ करना क्यों जरूरी है! मैंने अपनी बात उनके सामने रखी।

उन्होंने कहा-आश्चर्य है, तुम जैसे लोगों के कारण ही हम अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी को उसका यथेष्ट स्थान नहीं दिला पाए हैं।राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए हमें एक आंदोलन का रूप देना होगा।हिंदी दिवस पर हर स्तर पर कार्यक्रम करना होंगे।इसे जन जन की भाषा बनाना होगा।स्कूल,कॉलेज, सरकारी दफ्तर यानी हरेक जगह निबंध प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता,पोस्टर, रैली जैसे कार्यक्रम आयोजित कर जनजागरूकता लाना होगी।

मैंने सहमति प्रकट करते हुए कहा-ठीक है भाई साहब,जैसा आप कहेंगे।मैं आपके साथ हूँ और सदैव तत्पर रहूंगा।

चलो तुम हमारी टीम के साथ तैयारी करो।मैं अपने पोते-पोती को कांवेन्ट स्कूल से लेकर घर छोड़ कर आता हूँ क्योंकि बेटे -बहू अपने अंग्रेजी कोचिंग संस्थान में व्यस्त हैं। इस वर्ष मै चाहता हूँ कि पिछले वर्ष से भी ज्यादा और जोरदार कार्यक्रम हो।इसीलिए तुम्हें भी पहली बार अपनी समिति से जोड़ रहे हैं।देखना, कवि सम्मेलन और साहित्यिक कार्यक्रमों से समा बांध देंगे।क्या कहते हो।

परिचय - डॉ प्रदीप उपाध्याय

जन्म दिनांक-21:07:1957 जन्म स्थान-झाबुआ,म.प्र. संप्रति-म.प्र.वित्त सेवा में अतिरिक्त संचालक तथा उपसचिव,वित्त विभाग,म.प्र.शासन में रहकर विगत वर्ष स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ग्रहण की। वर्ष 1975 से सतत रूप से विविध विधाओं में लेखन। वर्तमान में मुख्य रुप से व्यंग्य विधा तथा सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर लेखन कार्य। देश के प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सतत रूप से प्रकाशन। वर्ष 2009 में एक व्यंग्य संकलन ”मौसमी भावनाऐं” प्रकाशित तथा दूसरा प्रकाशनाधीन।वर्ष 2011-2012 में कला मन्दिर, भोपाल द्वारा गद्य लेखन के क्षेत्र में पवैया सम्मान से सम्मानित। पता- 16, अम्बिका भवन, बाबुजी की कोठी, उपाध्याय नगर, मेंढ़की रोड़, देवास,म.प्र. मो 9425030009