ग्रेटा की ग्रेटनेस

जब भी मैं बाजार जाती हूं, दुकान पर कोई-न-कोई आदमी थैली देने के लिए गिड़गिड़ा रहा होता है. न तो लोग घर से कोई थैली लाते हैं, न 5-10 रुपए खर्च करके थैली खरीदना चाहते हैं. देश के अत्यंत प्रदूषित पर्यावरण को देखते हुए भी लोग खुद तो सचेत हो नहीं रहे हैं, सरकार के बार-बार चेताने पर भी उनमें जागरुकता नहीं आ पा रही है. ऐसे में मुझे याद आ गई ग्रेटा की ग्रेटनेस.
”आपने नाव से अटलांटिक सागर पार करके न्यू यॉर्क पहुंचने का इरादा क्यों किया?” अटलांटिक सागर पार करके न्यू यॉर्क पहुंची 16 साल की ग्रेटा से पत्रकारों ने पूछा.
”आपके समीचीन प्रश्न ने मुझे कुछ कहने का मौका दिया है,” ग्रेटा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा- ”मैं विमान से भी आ सकती थी, पर दुनिया को विमान से कार्बन उत्सर्जन को बचाने का संदेश देना भी आवश्यक था. कार्बन उत्सर्जन से हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता है.” ग्रेटा के इस कथन से उसके स्वागत में वहां खड़े हजारों लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से वातावरण गूंज उठा.
पढ़ाई की उम्र में पर्यावरण के लिए मुहिम चलाने वाली स्वीडन-निवसी 16 साल की ग्रेटा थुनबर्ग को न्यू यॉर्क में बड़ा सम्मान मिला. एमनेस्टी इंटरनैशनल ने अपना सबसे बड़ा अवॉर्ड ‘एंबैस्डर ऑफ कान्शन्स’ ग्रेटा को दिया.
ग्रेटा थुनबर्ग पर्यावरण के लिए काम करने वाले युवाओं के बीच एक बड़ा प्रतीक बन गई हैं. इसकी शुरुआत उन्होंने स्वीडन के अपने स्कूल से की थी. वह हफ्ते के हर शुक्रवार को हड़ताल करती थीं. धीरे-धीरे उनका यह अभियान दुनिया के 100 शहरों में फैल गया.
हम ग्रेटा की ग्रेटनेस से कम-से-कम इतनी तो प्रेरणा लें, कि घर से कपड़े की थैली लेकर चलें, ताकि प्लास्टिक की थैली से छुटकारा मिले. आखिर पहले भी तो हम कपड़े की थैली का उपयोग करते ही थे न! पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए इतना-सा सहयोग भी अच्छी शुरुआत कर सकता है.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।