लघुकथा

अनूठी रस्म

विवाह के बाद पहली करवा चतुर्थी पर पारिवारिक रस्म निभाने के लिए मेरी पत्नी मेरी माँ के लिए एक साड़ी लेकर आई। मेरी माँ ने कहा कि बहू दो साड़ी लेकर आइए। मेरी पत्नी कहना मान कर चुपचाप दो साड़ी लेकर आईं तो मेरी माँ ने कहा कि बहू मेरे पास दर्जनों साड़ी रखी है। इस परिवार में तुम अपने सुहागिन के त्यौहार पर एक नई रस्म की शुरुआत करो । ये दो साड़ी मेरे स्कूल में पोषाहार बनाने वाली बहनों को देना। मेरे से अधिक आवश्यकता उनकी है। मेरी पत्नी ने जब इस अनूठी रस्म की शुरुआत की तो पोषाहार बनाने वाली बहनों ने मेरी पत्नी को इतने आशीर्वाद दिए कि मेरी पत्नी को करवा चतुर्थी का त्यौहार सार्थक लगा एवं वह अपनी भीगी पलकें से उनके पैर छूकर अनमोल आशीर्वाद ले रही थी।

— दिलीप भाटिया

*दिलीप भाटिया

जन्म 26 दिसम्बर 1947 इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और डिग्री, 38 वर्ष परमाणु ऊर्जा विभाग में सेवा, अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक अधिकारी