व्यंग्य- डग्गामार यात्रा वृतांत

काशी बोले वाराणसी कौन नही जानता है, पडो़सी जिला से लगा हूं। आना-जाना हमेशा लगा रहता है, कभी साहित्य के कार्य से कभी व्यापार के लिये समय देते थे। सरकारी बसो की किराये बेतहाशा बढ़ जाने से दुखी हो गया। एक मित्र ने सुझाव दिया ” कवि महोदय वाराणसी प्राइवेट बस से यात्रा करो सरकारी बसो से कम किराये पर मान जायेगे। मुझे सुनकर बहुत खुशी हुआ, मित्र को गले से लगाकर कहा “चलो अब किराये की समस्या से छुटकारा मिल गया।
एक कवि सम्मेलन के लिये वाराणसी जाने के लिये घर से निकल लिये बस अड्डे पर जोर- जोर वाराणसी चिल्लम चिल्ला कर रहे थे। कंडेक्टर ने बहुत प्यार से देखा मानो भक्त भगवान के तस्वीर की तरफ देख रहा हो। बस में बैठ गया, यही कही बस में 20 सवारी बैठे थे। सीटी बज गया, बस निकल गया। मन में मित्र को बहुत शुक्रिया किया चलो बहुत पते की बात किया है।
कुछ दूर चलने के बाद बस रोक कर सवारी भर लिये, दस कदम पर चलता। पूरा बस खचाखच हो गया, आगे दूध के बल्टा वाले सवार होने लगे
कंडेक्टर ने सावधान किया” अरे सभी अपने पैर बचाओ, हम जिम्मेदार नही होगे। तभी दूध वाले ने मेरे पैर पर बल्टा दे मारा मैं दर्द से चिल्लाने लगा, जो कंडेक्टर बस में बैठाते वक्त मिठाई की दुकान जैसा जैसा शक्कर घोल रहा था, वो लाल मिर्ची जैसा घातक हो गया चिल्ला कर बोला “पहले बताया था कि संभाल कर बैठो।
अब जब बैठ गया तब क्या करे, अचानक चालक ने ब्रेक लगा दिया “अरे भाई भाई क्या हुआ। कंडेक्टर “कुछ नही कालेज के लड़के है। मैं बोला “अरे बीच रास्ते में बस रोक….. क्या करे कल को बस का शीशा नही बचेगा, कालेज वालो से कौन पंगा ले।
खाली बस अब मुम्बई की लोकल बन गया अपना पैर का पता नही चल रहा है। खैर टूटे सड़क भी पुराने जख्म कुदेर रहे थे  किसी तरह रोते बिलखते मन से वाराणसी पहुंच गया।
मन में मित्र को बहुत कोसा “अबे कौन सा दुश्मनी था जो ऐसा सजा सरकारी बस में नही जाने दिया,डग्गामार पर बैठा दिया. आयोजक ने फोन करके कहा “कहां रह गये, समय पर ध्यान नही देते कार्यक्रम खत्म हो चुका है अब वापस लौट जाओ।
वापस लौटने के लिये पुन: डग्गामार बस की तरफ नही देखा, सीधे सरकारी बस अड्डे पर निकल गया।
अभिषेक राज शर्मा

परिचय - अभिषेक शर्मा

कवि अभिषेक राज शर्मा जौनपुर (उप्र०) मो. 8115130965 ईमेल as223107@gmail.com indabhi22@gmail.com