कृत संकल्प (लघुकथा)

“मुझसे हाथ मिलाओगे,
साथ में दो डग आओगे,
“तुझ-सा दोस्त न कहीं मिला है”,
बार-बार यह गाओगे.”

“अरे, यह कौन गा रहा है!” सुकेश आश्चर्यचकित हो इधर-उधर देख रहा था.

”नहीं न दिखा मैं? अगर मुझसे दोस्ती नहीं निभाई तो शायद एक दिन ऐसा भी आएगा, कि मुझे बिलकुल ही देख नहीं पाओगे. इससे भी आगे बढ़कर मैं तो यह कहूंगा, कि मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.”

“पर यह तो बताओ, तुम हो कौन?”

“लो मेरी इतनी तरल आवाज से भी मुझे नहीं पहचाना?”

”तरल आवाज तो हमारी मैडम तरला की भी है, जो मेरा जीवन है!”

”और तुम मुझे भी तो जीवन कहते हो न! साथ ही मुझे अमृत कहते हो और सलिल इत्यादि भी.”

”अच्छा-अच्छा तो तुम जल-नीर-पानी-तोय-अम्बु बोल रहे हो?”

”वाह-वाह! मेरे पर्यायवाची तो बहुत रट रखे हैं, लेकिन मेरी कद्र कभी नहीं करते. मुझे व्यर्थ बहाते रहते हो. एक दिन मैं न मिलूं तो पशेमान हो जाते हो, फिर भी गफ़लत में रहते हो.”

”अरे नहीं भाई, तुम्हारे बिना तो सचमुच हमारे सारे काम रुक जाएंगे!”

”तुम्हारे काम क्यों रुकेंगे? तुम तो बुद्धिजीवी हो न! पानी भी नकली बना लोगे.”

”नहीं भाई, नकली पानी से क्या होगा? पानी तो असली ही चाहिए.”

”छोड़ो-छोड़ो, तुम्हारी तो आंखों का पानी भी सूख गया है. सुना नहीं, अर्मेनिया की 22 साल की महिला की आंखों से आंसू की जगह रोज 50 क्रिस्टल निकलते हैं. क्रिस्टल से अमीर बने रहना.”

”तुम्हारे बिना अमीरी किस काम की! तृषा और क्षुधा तो तुम ही शांत कर सकते हो.”

”तुम्हारे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है. चारों वेदों में मेरे लिए अर्णः, क्षोदः, क्षद्म, नभः, अम्मः, कवन्धम्, सलिलम्, वाः, वनम्, घृतम, मधु, पुरीषम्, पिप्पलम्, क्षीरम्, विषम्, रेतः आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है. हाथ-पैर भी रेत से साफ कर लेना और आटे की जगह रेत फांक लेना, क्योंकि मेरे अभाव में तो गेहूं आदि खाद्य पदार्थ भी नहीं उग पाएंगे.”

सुकेश मानो सोते से जाग गया और वर्षा के जल का संचयन करने के साथ सबको पानी की बचत के ढेरों उपाय बताने के लिए कृत संकल्प हो गया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।