व्यंग्य – चालान के चक्कर में घन-चक्कर

यातायात के नए नियमों से भारतीय जन जीवन में द्रुतगामी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे हैं। कुछ लोगों की अक्ल ठिकाने आ गई हैं तो कुछ लोग अक्ल दौड़ने लगे हैं। रातोंरात ट्रैफिक हवलदार अपने को देश का प्रधानमंत्री समझने लगा है। अब वह सौ-दो सौ के चढ़ावे से सहमत हो जाए, यह मुमकिन नहीं है। बढ़ते जुर्माने से बहुतों की जेेबें खाली और बहुतों की भारी हो गईं हैं। मिस शर्मा ब्यूटीपार्लर की पूरी दुकान जो अपनी सुंदर लहराती जुल्फों का जलवा अपनी स्कूटी पर सवार होकर सब पर बिखरती थी, अब उसे हेलमेट की नजर लग गई है। गली के लुच्चे लौंडो का बाइक पर फैशन वॉक करना अब लगभग बंद हो गया है।
शराब प्रेमी अब पीकर वाहन चलाने की बजाय एक जगह शांति से बैठकर पार्टी पूरी तरह एन्जॉय कर रहे हैं। इस नयी प्रक्रिया में ट्रैफिक हवलदार पूरी तरह व्यस्त हो गए हैं। उनकी दुकानें चमकने लगीं हैं। ग्राहकों की लंबी कतारें देखकर नोटबंदी वाला सीन आंखों के सामने जीवित हो रहा है। चालान के चक्कर में कुछ लोग घन-चक्कर बन रहे हैं। अपनी गलती मानने की बजाय यह अपनी बाइक का होलिका दहन कर अपनी सूझबूझ का नमूना पेश कर रहे हैं। एक सज्जन महाशय ने चार दिन पहले ही शोरूम से 65 हजार की एक्टिवा पेटी पैक उठाई थी। अभी तो नई नवेली एक्टिवा की खुशी में मोहल्ले में पेड़े भी बांटने थे कि उससे पहले ही उन्हें जुर्माने के रूप में 40 हजार का फटका लग गया। सारी खुशियों पर सड़क एवं परिवहन विभाग ने पानी फेर दिया। वैसे तो 4 हजार में ट्रैफिक हवलदार मामला रफा-दफा करने के लिए राजी हो गया था। लेकिन वे ठहरे सिद्धांतवादी पूरा जुर्माना देकर ही माने। उनका मानना था कि हमारी दु:ख की घड़ी में ट्रैफिक हवलदार भी दिवाली कैसे मना लें।
अब राह पर पैदल वॉक करने वाले अस्सी वर्षीय रामू काका को सुरक्षा का अनुभव हो रहा है। उन्हें अब यह नहीं कहना पड़ रहा है कि ‘ए भाई, ज़रा देख के चलो।’ गाड़ियों की गति मंदी के माफिक मंद हो गई है। गति कम होने से गड्ढों की पोल खुलने से रह गई हैं। लेकिन इन सब के बीच किसी हीरो द्वारा अपनी प्रेमिका को बाइक की पिछली सीट पर बैठाकर ‘सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं’ वाला नग़मा गाने का मजा गायब हो गया है। जान पर जुर्माना भारी लगने लगा है। सड़कों पर फिल्मी सीन कम होने लगे हैं। सड़क पर अब लाल रंग की होली खेली जानी अस्थायी रूप से थम गई है। अब वाहन चालकों को हर दिन सड़क सुरक्षा सप्ताह का अहसास होने लगा है।
लाइसेंस के लिए लोगों का हुजूम यातायात विभाग के बाहर कुंभ मेले का अनुभव ताजा कर रहा है। इस बीच दलालों के रोज नए-नए गिरोह पनपने लगे हैं। यह दलाल खुले सांड़ की तरह मजबूरी में महात्मा गांधी बने वाहन चालकों को अपने सींग मार रहे हैं। बहरहाल, फिल्म चालू है। क्लाइमैक्स धूम मचा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फिल्म का अंत क्या अंजाम लेता है।
— देवेन्द्रराज सुथार

परिचय - देवेन्द्रराज सुथार

देवेन्द्रराज सुथार , अध्ययन -कला संकाय में द्वितीय वर्ष, रचनाएं - विभिन्न हिन्दी पत्र-पि़त्रकाओं में प्रकाशित। पता - गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। पिन कोड - 343025 मोबाईल नंबर - 8101777196 ईमेल - devendrasuthar196@gmail.com