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”रेटिना के डॉक्टर साहब आए हैं क्या?” समाजसेवक सुनील ने शहर के सुप्रसिद्ध प्राणी हॉस्पिटल के काउंटर पर जाकर पूछा, जहां थलचर, जलचर तथा नभचर पशु-पक्षियों आदि प्राणियों की चिकित्सा होती थी.

”जी आए हैं.” रिसेप्शनिस्ट ने विनम्रतापूर्वक कहा.

”एक कछुए का रेटिना चेक करवाने आया हूं.”

”ठीक है.” रिसेप्शनिस्ट ने रजिस्ट्रेशन करके उनको कमरा नं. बताते हुए डॉक्टर साहब तक पहुंचने के लिए आवश्यक निर्देश दिये.

”हां जी बताइए.”

”डॉक्टर साहब, इसकी रेटिना में कुछ गड़बड़ी लग रही है.”

”इसकी रेटिना में इंजेक्शन लगाना पड़ेगा.” डॉक्टर साहब ने कछुए की आंखों का चेकअप करते हुए कहा.

”कारण? कछुओं के रेटिना में असामान्य रूप से बड़ी संख्या में कोशिकाओं के होने से ये आसानी से रात के अंधेरे में देख लेते हैं न!”

”आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है महाशय! बात यह है कि हम स्वच्छता, पर्यावरण, प्रदूषण और सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग करने की बात तो करते हैं, मगर असलियत में करते कुछ भी नहीं. अब तो इस प्लास्टिक-प्रदूषण का खतरा इतना विकराल रूप ले चुका है, कि निकट भविष्य में हमें कछुओं-मछलियों आदि जलचरों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए अनेक अस्पताल खोलने पड़ेंगे. ”

”समस्याएं तो हमको भी बहुत आ रही हैं, सांस की बीमारियां दम घोंट रही हैं.”

”बिलकुल. माइक्रोप्लास्टिक के कण शरीर के अंदरूनी हिस्सों मसलन फेफड़ों, रक्त वाहिकाओं और मस्तिष्क के न्यूरॉन कोशिकाओं तक में आसानी से प्रवेश कर उसमें अपना स्थाई अड्डा बना चुके हैं.” डॉक्टर साहब की पेशानी पर परेशानी स्पष्ट झलक रही थी.

”माइक्रोप्लास्टिक! यह क्या होता है?” सुनील को शायद समझ नहीं आया था.

”हाल ही में वैज्ञानिकों के नवीनतम शोधों के अनुसार मानव शरीर में उसके पहने सिंथेटिक कपड़ों, उसके लगाए चश्मे के कांटैक्ट लेंस, उसकी कार के टायरों से निकलकर भी उसके शरीर में प्रवेश करते रहते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार मानव द्वारा सबसे शुद्ध माना जाने वाला ब्रांडेड सीलबंद बोतल की पानी तक से भी मात्र एक साल में 92 हजार तथा उसके द्वारा साँस लेने में वायुमंडल में सर्वत्र फैले वायु से भी एक लाख इक्कीस हजार माइक्रोप्लास्टिक के अतिसूक्ष्म कण उसके शरीर में जा रहे हैं. यही नहीं, हमारे द्वारा जल-थल में फेंके गए सिंगल यूज प्लास्टिक के थैलों से सभी पशु-पक्षी व जलचर प्राणी भी इसके दुष्प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं. मैं आपको कछुए के इलाज के लिए लिख देता हूं, शेष आपको जूनियर डॉक्टर बताएंगे. आशा है, यह कछुआ आसानी से रात के अंधेरे में और पराबैंगनी किरणों से लेकर लाल रंग तक को देख सकेगा.”

”शुक्रिया डॉक्टर साहब” कहते हुए समाजसेवक सुनील की दूरदृष्टि मनुष्यों, थलचरों, जलचरों, नभचरों आदि के भयंकर खतरे को भांपकर अनिवार्य कदम उठाने के लिए स्पष्ट योजना आकार लेने लगी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।