कविता

मत कहो कि ”कुछ नहीं हो सकता”

क्यों कहते कुछ नहीं हो सकता?
चाहो तो सब कुछ हो सकता,
कोशिश तो करो मन से प्यारो,
मत कहो कि ”कुछ नहीं हो सकता”.

तुम रक्तदान कर सकते हो,
तुम चक्षुदान कर सकते हो,
चिपको आंदोलन फिर से छेड़,
पेड़ों को बचा तुम सकते हो.

नारी अस्मिता का बीड़ा ले,
नारी-रक्षा कर सकते हो,
परिवार में सद्भावना बढ़ा,
उसको मधुरिम कर सकते हो.

क्यों कहते कुछ नहीं हो सकता?
चाहो तो सब कुछ हो सकता,
कोशिश तो करो मन से प्यारो,
ये कहो कि ”सब कुछ हो सकता”.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “मत कहो कि ”कुछ नहीं हो सकता”

  1. हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
    इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

    आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
    शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

    हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
    हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

    सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
    सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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