कविता

स्वप्न दीप

दीप जला एक सपने में, वह सपना चंचल भोला था
 मृग नयनों ने जब पाला तो, मृदु अधरों ने भी बोला था ।
पंख ना तो तुम इसको रश्मि ,इसे अम्बर तक अभी जाना हैं
फिर संध्या हुई साॅ॑झ की रंगमयी, साॅ॑झ हुई सन्ध्या की करुणा ।
 बना व्योम की पावन बेला ,  जुगनू से राह सजाना था
उड़ते खग– मृग पुलकित होते, अपनी सुध– बुध में थे डूबे ।
    स्नेह बना अम्बर से जब तो , तारों ने भी स्वीकार किया
ये थी मेरी स्वप्न व्यथा  जिसने उज्जवल अक्षर जीवन पाया ।
 बिखरी थीं जो स्मृती क्षार– क्षार, तब एक दीपक ने मुझको
अजर –अमर बनाया , फिर स्नेह– स्नेह हमने  पहचाना !
 लिया संकल्प अब लौं बन जाना हैं, दीप जला एक सपने में।।”
— रेशमा त्रिपाठी

परिचय - रेशमा त्रिपाठी

नाम– रेशमा त्रिपाठी जिला –प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश शिक्षा–बीएड,बीटीसी,टीईटी, हिन्दी भाषा साहित्य से जेआरएफ। रूचि– गीत ,कहानी,लेख का कार्य प्रकाशित कविताएं– राष्ट्रीय मासिक पत्रिका पत्रकार सुमन,सृजन सरिता त्रैमासिक पत्रिका,हिन्द चक्र मासिक पत्रिका, युवा गौरव समाचार पत्र, युग प्रवर्तकसमाचार पत्र, पालीवाल समाचार पत्र, अवधदूत साप्ताहिक समाचार पत्र आदि में लगातार कविताएं प्रकाशित हो रही हैं ।

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