मुमताज

मुमताज़
हां…. मुमताज़ ही तो
कहा था तुमने मुझे
कितनी खुश हुई मैं सुनकर
ताजमहल जैसी कोई याद
बनेगी मेरे लिए भी
अमर हो जाउंगी जिसके
दर ओ दीवार में
सदा के लिए मैं…..
याद रखेंगी ये दुनियां मुझे
कई सदियों तक….
मगर मैं ये कहाँ जानती थी
वो ताजमहल बनेगा
मेरे ही ख्वाबो की नींव पर
जिसकी दीवारें रंगी जाएंगी
मेरे ही अरमानो के खून से
यमुना के पानी को
बरकार रखेंगी ये आँखें
और उसी की तह में
दफनाया जाएगा इक दिन मुझे ही।

परिचय - प्रिया वच्छानी

नाम - प्रिया वच्छानी पता - उल्हासनगर , मुंबई सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाए प्रकाशित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचो पर काव्यपाठ E mail - priyavachhani26@gmail.com