भारतीय संस्कृति में वीर सावरकर का योगदान विषयक संगोष्ठी का आयोजन, वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने का समर्थन

लखनऊ। अभी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने स्वतंत्रता सेनानी अपने चुनावी घोषणापत्र में वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने का वादा किया था। जिसके बाद वीर सावरकर देश की राजनीति में एक बार फिर केंद्र बिंदु में आ गये हैं। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के प्रांगण में इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय संस्कृति में वीर सावरकर विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें सभी वक्ताओं ने वीरसावरकर जी के इतिहास व व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला और कहा कि वीर सावरकार को भारत रत्न बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। अब सरकार को यह निर्णय लेने में और अधिक देर नहीं करनी चाहिए।
विषय प्रवर्तन करते हुए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के कुंअर आजम खाँ ने कहा कि आज विरोधी दलोें की ओर से यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी जबकि वास्तविकता यह है कि उन्होंने अपने जीवन के लिए नहीं, अपितु देश के लिए जीने की खातिर अंग्रेजो से माफी मांगी थी। साथा ही यह जो प्रचार किया जा रहा हैे कि वे मुस्लिम विरोधी थे, पूरी तरह गलत है। जब वह जेल में थे उस समय वहा पर जो जेलर था, वह बहुत ही कुख्यात था तथा वहां पर उस समय धर्मांतरण भी कराया जाता था। सावरकर जी के लिए जो मुस्लिम तैनात किया गया था वह बलूच थे जिनकी वह अपने लेखन में प्रशंसा करते हैें। वह बंगाली और तमिल मुस्लिमों की प्रशंसा करते हैं। वह अंग्रेजों के पक्ष मेें कैसे हो गये यह नहीं पता। वह लेखक, कवि, उदारवादी, राष्ट्रवादी थे। हिंदुत्व एक राजनैतिक विषय था। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती अटल सरकार ने वीर सावरकर को भारत रत्न देने का फैसला कर लिया था लेकिन पता नहीं क्यों रोक दिया गया था। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बाबूलाल जी ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए देश में कई युद्ध हुए। लेकिन यह वीर सावरकर ही थे जिन्होंने 1857 को देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया। उनकी पुस्तक से अंग्रेज सरकार बुरी तरह घबरा गयी थी और वह प्रकाशित होने से पहले ही जब्त कर ली गयी थी। सावरकर जी एक स्टेªटजी के तहत बाहर आये थे। उनका मनोबल बहुत ऊंचा था।
संगोष्ठी में सभी वक्ताओं का एक मत था कि सावरकर जी के विषय में देश में बहुत सी भ्रातियां फैली हुई हैं। उन पर पहला आरोप यह लगाया जाता है कि वह अंग्रेजांे से क्षमा मांग कर बाहर आये थे। यह गलत है और दूसरा वह हिंदुत्ववादी थे, यह भी पूरी तरह से गलत है। वीर सावरकर पूरी तरह से राष्ट्रवादी थे। वह कभी रुके नहीं, झुके नहीं, टूटे नहीं। वीर सावरकर छुआछूत के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने ऐसा समाज के निर्माण का प्रयास किया जो एक हो। भारत रत्न के विरोधी वे लोग हैं जिन्हें किसी भी बात की कोई समझ नहीं है। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने भी उन्हें स्वतंत्रता सेनानी स्वीकार किया था और उन पर डाक टिकट जारी किया था।
वक्ताओं ने कहा कि सावरकर जी के प्रति सोची समझी साजिश रची गयी है। इतिहास के महानायकों को कोई ताकत समाप्त नहीं कर सकती। संघ के प्रचारक अरविंद जी ने सावरकर जी पर बोलते हुए कहा कि कोई भी देश, समाज, संस्कृति अपने पूर्वजों को त्यागकर जीवित नहीं रह सकती। यह चिंतन समाज का है कि किसको कितना सम्मान मिलना चाहिए इसी के अंतर्गत गुरु गोविंद सिंह और छत्रपति शिवाजी दोनों का जीवन प्रतिष्ठित था। संगोष्ठी को संबोधित करते हुये अध्यक्ष अजय दत्त जी ने कहा कि आज सावरकर जी के विचारों को सुनियोजित साजिशों के तहत जकड़कर रख दिया गया है। 1939 के बाद उनके जीवन व कार्यकलापों की चर्चा नहीं की गयी है तथा उसके बाद का इतिहास जानबूझकर गायब कर दिया गया है। वह आर्थिक तौर पर वामपंथी थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण की बात करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। देश के औद्योगीकरण की बात उन्होंने कही। गांधी जी की विचारधारा के वे विरोधी थे। द्वितीय विश्व युद्ध के समय गांधी जी ब्रिटिश सेना में भारतीयों के शामिल होने के विरोधी थे, जबकि सावरकर कहते थे कि भारतीयों को ब्रिटिश सेना मेें शामिल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व पूरी तरह से पालीटिकल वल्र्ड था।
उन्होंने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद आज तक किसी भी क्रांतिकारी को ‘भारत रत्न’ नहीं मिला। सावरकर जी को अगर ‘भारत रत्न’ मिलता है तो यह समस्त क्रांतिकारियों का सम्मान होगा।