न्यायालय का फैसला, करते सब स्वीकार. नहीं किसी की जीत है, नहीं किसी की हार!

९ नवम्बर २०१९ भारत के लिए ऐतिहासिक दिन के रूप में याद किया जाएगा. न्यायिक इतिहास में ऐसा ऐतिहासिक फैसला, जो देश को राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों को एकजुटता के सूत्र में पिरोयेगी. ऐसा फैसला जिसे सभी सम्प्रदाय, पथों और धर्मों के आम और ख़ास लोगों ने दिल से स्वीकार किया. पक्ष-विपक्ष, वादी-प्रतिवादी, आस्था और साक्ष्यों आदि सभी का भरपूर मान रक्खा. यह देश का सबसे संवेदनशील मामला तो था ही, दुनिया के भी महत्त्वपूर्ण मामलों में से एक था. अंतत: अयोध्या का रामजन्म भूमि स्थल जिसे कई दसकों से विवादित स्थल के रूप में जाना जा रहा था, भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकारी न्यास (जिसे तीन महीने के अन्दर सरकार द्वारा गठित किया जाना है) के जिम्मे सुपुर्द कर दिया गया. यह सरकारी न्यास अब राम मंदिर निर्माण में आगे का कदम उठायेगी और देश के करोड़ों लोगों के आस्था और विश्वास को भी मान्यता प्रदान करेगी.

प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने भी अपने रामचरित मानस में लिखा है –

जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

अर्थात – जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥

शायद इसी दिन का इंतज़ार इस फैसले के लिए भी किया जा रहा होगा. सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों को लोगों ने पञ्च परमेश्वर की उपाधि से भी नवाजा, और उनके फैसले को सर्वोत्तम माना.

या कहें – जैसा जब जब होना है वैसा तब तब होता है.

मोदी जी ने फैसले के बाद अपने संबोधन में कहा है कि ९ नवम्बर अपने आप में महत्त्वपूर्ण है. इसी दिन यानी ९ नवम्बर १९८९ को बर्लिन की दीवार शांतिपूर्ण तरीके से गिरा दी गई थी और पूर्वी एवं पश्चिमी बर्लिन के लोग फिर से एक हो गए थे. दोनों के बीच एक शीत युद्ध का अंत हुआ था. इस फैसले को उस तरीके से भी जोड़कर देखा जा सकता है मानो दो भाइयों के बीच की दूरियां ख़त्म हुई और आपस में भाईचारा और सौहार्द्र की वृद्धि हुई.

९ नवम्बर १९८९ को ही मंदिर के लिए शिलान्यास हुआ था. ९ मई २०११ को यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और ९ नवम्बर २०१९ को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया. यह काफी महत्त्वपूर्ण है.

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इस फैसले के अनुसार राम जन्मभूमि का अन्दर और बाहरी अहाता यानी पूरी जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए दे दी गई. केंद्र सरकार तीन महीने के अन्दर न्यास या बोर्ड का गठन करेगी. इस न्यास यानी ट्रस्ट को मंदिर निर्माण से लेकर बाकी सभी अधिकार होंगे. गैरकानूनी ढंग से मुसलमानों की मस्जिद तोड़े जाने के एवज में उसे पुनर्वासित करने के लिए कोर्ट ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन वैकल्पिक जगह पर आवंटित करने का भी आदेश दिया जहाँ वे मस्जिद का निर्माण कर सकें.

इस फैसले का आधार और साक्ष्य ASI की उत्खनन रिपोर्ट को माना गया. ASI के अनुसार १२ सदी में हिन्दू आस्था मूल के धार्मिक स्थल थे, जिसके दीवारों पर ही कथित मस्जिद बनाई गई. मस्जिद के लिए अलग से नींव की खुदाई नहीं की गई थी. ४० दिनों तक सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई हुई और १०४५ पन्नों के फैसले को ३८ मिनट में सुनाया गया.

इस अयोध्या विवाद के अतीत में जाने से मालूम होता है कि २१ मार्च १५२८ को बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने मंदिर को तोप से ध्वस्त कर दिया था. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम के स्वधाम गमन के बाद सरयू में आई भीषण बाढ़ से अयोध्या के भव्य विरासत को काफी क्षति पहुँची थी. भगवान राम के पुत्र कुश ने अयोध्या की विरासत को नए सिरे से सहेजने का प्रयास किया और राम जन्म भूमि पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया. युगों के सफ़र के बाद यह मंदिर जीर्ण शीर्ण हो गया तो विक्रमादित्य(ईसापूर्व १०१) ने इसका पुनरुद्धार कराया. डेढ़ हजार साल से अधिक समय तक यह मंदिर हिन्दुओं के आस्था और अस्मिता का शीर्षस्थ केंद्र रहा. मुग़ल काल में इस मंदिर को क्षति पहुंचाकर वहां मस्जिद का निर्माण कराया गया तब से यह स्थल विवादित बन गया. हिन्दू राजाओं ने इस मंदिर की वापसी के लिए कई लड़ाईयां लड़ीं. इन लड़ाइयों के परिणाम स्वरुप, कहते हैं अकबर ने बीरबर और टोडरमल की राय से बाबरी मस्जिद के सामने चबूतरे पर मंदिर निर्माण की अनुमति दे दी. पर औरंगजेब और ज्यादा कट्टर निकला. उसके साथ भी हिन्दू राजाओं ने कई लड़ाइयां लड़ीं पर औरंगजेब के सामने अंत में परास्त हो गए.

बाल्मीकि रामायण और स्कंध पुराण के श्लोकों का दृष्टान्त देकर भी यह समझाया गया कि अयोध्या ही वह पवित्र भूमि है जहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था. कई विदेशी यात्रियों के दस्तावेजों से भी यह प्रमाणित होता है कि अयोध्या में भगवान राम का यही जन्म स्थान था और यहाँ मौजूद मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद का निर्माण हुआ था.

अब जबकि भव्य राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो गया है, तब यह उम्मीद की जाने लगी है कि बहुत जल्द अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनेगा. इस मंदिर के प्रमुख शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा के अनुसार २०२२ तक मंदिर निर्माण का काम पूरा हो जायेगा. प्रारूप के अनुसार इनमे पांच प्रकाहंद होंगे- अग्रभाग, सिंहद्वार, नृत्य मंडप, रंग मंडप और गर्भगृह. आस्थावान हिन्दू शीघ्र ही भगवान राम के भव्य मंदिर का दर्शन कर उसमे पूजा अर्चना कर सकेंगे. राजनीतिक दल भाजपा, विश्व हिदू परिषद्, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ आदि हिंदूवादी संस्थाओं के आधार मजबूत होंगे. हिन्दू आस्था को बल मिलेगा.

उम्मीद की जानी चाहिए कि श्री राम मंदिर के निर्माण के क्रम में और निर्माण के बाद भी हम सभी श्री राम के आदर्शों पर चलकर अपनी आस्था को और मजबूत करेंगे. मर्यादा का पालन करेंगे, आपसी भाईचारा और सौहार्द्र को बढ़ावा देंगे और मुस्लिम भाइयों के साथ प्रेम सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उनके लिए मस्जिद के निर्माण में भी हर संभव सहायता करेंगे. शांति व्यवस्था और सौहार्द्र को कायम रक्खेंगे! यही हमारे भारतवर्ष की गंगा यमुनी तहजीब है. यही हमारे ऋषि-मुनियों और साधु-संतों का भी आदर्श है.

जय श्री राम! सियावर राम चन्द्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय! भारत माता की जय!

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.