अंगूठा

कभी-कभी कोई सामान्य-सी बात भी अतीत के झरोखों में ले जाती है, यह बात मुझे आज समझ में आई.

सुबह उठते ही दाहिने हाथ के अंगूठे के दर्द ने मुझे उंगलियों की महासभा में पहुंचा दिया. वर्तमान के विवादपूर्ण माहौल ने इस महासभा को भी विवाद का मंच बना दिया था.

अंगूठा अपने को उंगलीराज की पदवी का अधिकारी समझता था, तो तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अपना ही राग अलाप रही थीं.

कनिष्ठा को अपने दूसरे नाम कनिष्का पर भी गर्व था और सबसे छोटी होने के कारण उसे सबसे अधिक प्रेम की आकांक्षा भी थी.

अनामिका दिल की करीबी और विवाह की अंगूठी पहनने के कारण गर्वित थी.
मध्यमा सबसे बड़ी होने के दर्प से दीपित थी.

तर्जनी की तो बात ही निराली थी. अंगूठे के साथ योग में सहायक होने, तर्जनी में श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र थामने, बाण (तीर) चलाने में अंगूठे या मध्यमा के साथ तर्जनी का संग जरूरी होने, चुप रहने या जाने के इशारे की प्रतीक होने, खाद्य पदार्थ चखने, अंगूठे के साथ कलम पकड़ने, सुई में धागा पिरोने, कंचा फेंकने, चुटकी भरने, बटन लगाने आदि के कई रेकॉर्ड उसी के नाम थे.

शांत रहकर अंगूठा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था. सबने उसे कुछ कहने को उकसाया.

“अब मैं ही फरियादी बनूं और मैं ही जज, यह ठीक नहीं रहेगा. जब चुनाव ही होना है, तो आप में से कोई जज बने, तभी बात बनेगी.” अंगूठे ने अपने विचार रखे.

”इसका मतलब जो जज बनेगा, उसे चुनाव से बाहर होना पड़ेगा?” सभी ने मन में सोचा. तभी सबसे पहले बोलने वाली कनिष्ठा ने कहा- ”वैसे तो मैं सबसे छोटी हूं, फिर भी अगर आप सबको मंजूर हो, तो यह काम मैं ही कर देती हूं,” उसके सबसे छोटी होते हुए भी बाकी तीनों उंगलियों ने अपनी स्वीकृति दे दी, अन्यथा उनके निर्वाचन की राह ही बंद हो जाती.

“देखिए, मेरे विचार में मेरा महत्त्व सबसे अधिक है, क्योंकि मैं किसी भी उंगली के साथ तालमेल कर सकता हूं, पर मेरे बिना सबका काम रुक जाता है,” अंगूठे ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ”आपको गुरु द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांगने वाली बात तो याद ही होगी? उनका मानना था कि न होगा बांस न बजेगी बांसुरी…”

“पर यह तो पुराने जमाने की बात हुई.” मध्यमा ने बीच में टोकते हुए कहा.

“चलो इस जमाने की बात कर लेते हैं, इसी कॉलोनी में पार्वती गोयल आंटी रहती हैं न! उनका दाहिने हाथ का अंगूठा छोटा और मुड़ा हुआ है, फिर भी पूरी कॉलोनी में उनके जैसा कोई दिलदार और दमदार व्यक्ति नहीं होगा और उनके जैसी रसोई तो कोई बना ही नहीं सकता. सारे काम वे मेरे ही बलबूते पर करती हैं…”

“ठहरो-ठहरो, जिनके अंगूठा नहीं होता, वे भी तो सारे काम कर लेते हैं न!” अनामिका भला क्यों पीछे रहती!

“ऐसे तो जिनके दोनों हाथ ही नहीं होते, वे भी तैराकी तक कर लेते हैं.” तर्जनी कब तक चुप रह सकती थी.

“चलो यह भी सही, पर मुझे बात तो पूरी कर लेने दीजिए. अनूप की बात तो याद है न! नाम अनूप और काम कुरूप! कितने दुःख सहकर माता-पिता ने पाला था उसको, एक ही झटके में यह कहकर ”मैं आतंकी बनने जा रहा हूं.” माता-पिता के अरमानों के साथ देश की सुरक्षा को भी अंगूठा दिखा दिया था, यह तो भला हो उसकी मां की भावभीनी चिट्ठी का, जिसमें मां ने उसको आतंकवादियों के जाल से निकलकर घर आने के लिए राजी किया. जाने कैसे अनूप को सद्वुद्धि आ गई, कि उसने आतंकियों के जाल को छोड़कर अपने घर आने का मन बना लिया और आतंकवाद को अंगूठा दिखा दिया…”

“यही तो बात है, बस अंगूठा दिखा दो, चिढ़ा दो, साथ छोड़ दो, यही आता है तुम्हें…” तीनों उंगलियों ने एक साथ कहा- ”तुम हमारे राजा बनने लायक हो ही नहीं.”

“अब मेरी बात भी सुन लो,” जज साहिबा ने सबको चुप कराते हुए कहा- ”राजा बनने का हक तो केवल अंगूठे को ही है. आजकल जमाना ही अंगूठे का है. आपने देखा होगा कि अंगूठा दिखाकर चिढ़ाना तो पुरानी बात हो गई. अब तो आपको किसी की कोई भी बात अच्छी लगे, झट से अंगूठा दिखा दीजिए. सामने वाले का दिल बाग-बाग हो जाता है. फेसबुक पर जो लाइक है, वह भी तो अंगूठा ही है. लोग अधिकाधिक लाइक पाने के लिए ही न जाने क्या-क्या करते हैं! अब अंगूठा कुछ कहे-न-कहे, अंगूठे की महिमा अपरंपार है. सब मिलकर बोलो- अंगूठे महाराज की!”

“जय.” सबने एक साथ मिलकर कहा.

अंगूठे ने सिर झुकाकर सबका अभिवादन स्वीकार किया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।