समाधान

बड़ा बेटा तनिक हिचकते हुए प्लेट से कटलेट का आखिरी पीस ले रहा था. मां ने कहा- ”भाई से पूछ ले, वह सिर्फ कटलेट ही खा रहा है, रोटी-चावल नहीं.”

बेटे ने मान लिया. वह छोटे के पास गया और ”तू तो केला खा रहा है, अब कटलेट क्या खाएगा?” उसे केला खाते देखकर उसने सहज समाधान निकाल लिया.

इस प्यारे-से समाधान से नेहा को एक और किस्सा याद गया.

लड़का और लड़की की शादी तो हो चुकी थी, पर दोनों में बन नहीं रही थी. शादी के साल भर बाद ही चिक-चिक शुरू हो गई थी.

पत्नी अपने ससुराल वालों के उन अवगुणों का भी पोस्टमार्टम कर लेती, जिन्हें कोई और देख ही नहीं पाता था. सबने कोशिश कर ली कि किसी तरह यह रिश्ता बच जाए, दो परिवार तबाही के दंश से बच जाएं, पर सारी कोशिशें व्यर्थ थीं.

जो भी घर आता, पत्नी अपने पति की ढेरों खामियां गिनाती और कहती कि उसके साथ रहना असम्भव है. वो कहती कि इसके साथ तो एक मिनट भी नहीं रहा जा सकता. दो बच्चे हो चुके हैं और बच्चों की खातिर किसी तरह ज़िंदगी कट रही है.

उनके कटु रिश्तों की यह कहानी पूरे मुहल्ले में चर्चा का विषय बनी हुई थी.

“ऐ सब्जी वाले, तुम्हारे पास क्या-क्या सब्जियां हैं?” एक सब्जी वाले की आवाज सुनकर नम्रता ने पूछा. उसकी आवाज और लहजे में नम्रता का अंशमात्र भी नहीं था.

“बहन, मेरे पास आलू, बैंगन, टमाटर, भिंडी और गोभी हैं.” सब्जीवाले ने नम्रतापूर्वक कहा.

“जरा दिखाओ तो सब्जियां कैसी हैं?”

सब्जी वाले ने सब्जी की टोकरी नीचे रखी. महिला टमाटर देखने लगी.

सब्जी वाले ने कहा, “बहन आप टमाटर मत लो. इस टोकरी में जो टमाटर हैं, उनमें दो चार खराब हो चुके हैं, आप आलू ले लो.”

“अरे, चाहिए टमाटर तो आलू क्यों ले लूं? तुम टमाटर इधर लाओ, मैं उनमें से जो ठीक हैं उन्हें छांट लूंगी।”

सब्जी वाले ने टमाटर आगे कर दिए. महिला खराब टमाटरों को किनारे करने लगी और अच्छे टमाटर उठाने लगी. दो किलो टमाटर हो गया.

फिर उसने भिंडी देखनी शुरु की. “बहन, भिंडी भी आपके काम की नहीं. इसमें भी कुछ भिंडी खराब हैं. आप आलू ले लीजिए. वो ठीक हैं।”सब्जी वाला फिर बोला.

“बड़े कमाल के सब्जी वाले हो तुम! तुम बार-बार कह रहे हो आलू ले लो, आलू ले लो. भिंडी-टमाटर किसके लिए हैं? मेरे लिए नहीं हैं क्या?”

“मैं सारी सब्जियां बेचता हूं. पर बहन, आपको टमाटर और भिंडी ही चाहिए, मुझे पता है कि मेरी टोकरी में कुछ टमाटर और कुछ भिंडी खराब हैं, इसीलिए मैंने आपको मना किया. और कोई बात नहीं.”

“पर मैं तो अपने हिसाब से अच्छे टमाटर और भिंडियां छांट सकती हूं. जो ख़राब हैं, उन्हें छोड़ दूंगी. मुझे अच्छी सब्जियों की पहचान है.”

“बहुत खूब बहन, आप अच्छे टमाटर चुनना जानती हैं, पर आप अपने रिश्तों में एक भी अच्छाई नहीं ढूंढ पा रहीं! आपको उनमें सिर्फ बुराइयां-ही-बुराइयां नज़र आती हैं. जैसे आपने टमाटर छांट लिए, भिंडी छांट ली, वैसे ही रिश्तों से भी अच्छाई को छांटना सीखिए.”

उस शाम घर में बहुत अच्छी सब्जी बनी. सबने खाई और कहा, बहू हो तो ऐसी हो.

महिला को रिश्तों को सहेजने का समाधान जो मिल गया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।