ऋषि दयानन्द ने अविद्या दूर करने और समाज सुधार कार्यों से वैदिक धर्म की रक्षा की

ओ३म्

ऋषि दयानन्द (1825-1883) सन् 1863 में देश समाज का सुधार करने तथा विलुप्त वेद और वैदिक धर्म का पुनरुद्धार करने के कार्यों में प्रवृत्त हुए थे। उनके समय में शुद्ध वैदिक धर्म विलुप्त होकर इसमें नाना प्रकार के अन्धविश्वास, मिथ्या मान्यतायें तथा अन्यान्य सामाजिक कुरीतियां प्रचलित हो गई थी जिससे समाज असंगठित होकर विधर्मियों की कुचेष्टाओं, धर्मान्तरण तथा अन्याय शोषण का शिकार हो रहा था। बौद्धकाल के प्रभाव व वेदों को विस्मृत कर देने के कारण आर्य हिन्दू समाज मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, अवतारवाद आदि अनेकानेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक विकृतियों से ग्रस्त था। ईश्वर व आत्मा का स्वरूप भी भुला दिया गया था। ईश्वरोपासना की विधि से भी क्या विद्वान और क्या सामान्य जनता सभी अपरिचित थे और आडम्बरों व पाखण्डों की भरमार थी। समाज में अज्ञान की पराकाष्ठा थी। पाषाण की मूर्तियां बनाकर उनसे प्रार्थना की जाती थी और आशा की जाती थी इन मूर्तियों से उनकी मनोकामनायें सिद्ध होने सहित उन्हें सुख प्राप्त होगा। फलित ज्योतिष के आचार्य कर्म-फल सिद्धान्त को न मानकर ग्रह व उपग्रहों को हमारे वर्तमान व भविष्य के सुख व दुःखों का कारण मान रहे थे। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में ऋषि दयानन्द ने वेदों की ओर लौटने के लिये आर्यों व हिन्दुओं का आह्वान किया और अन्धविश्वासों व सामाजिक कुरीतियों पर तीव्र प्रहार किये जिससे देश की सामान्य जनता को अन्यान्य लाभ हुए। नारियों को शिक्षा का अधिकार, विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार, स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार, छुआछूत तथा भेदभाव का उन्मूलन, मांसाहार को पाप व जीवनोन्नति में बाधक कार्य, मूर्तिपूजा से हानियां जैसे अनेक विषयों पर वेदानुकूल ज्ञान का लोगों में प्रचार होने से समाज उन्नति व कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हुआ।

मनुष्य की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा अविद्या वा अज्ञान है। विद्या की प्राप्ति वेद ऋषियों के साहित्य ग्रन्थों के अध्ययन से होती है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश लिखकर वेद एवं अन्य सभी वैदिक साहित्य का निचोड़ सार अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है जिसे पढ़कर मनुष्य सभी वैदिक शास्त्रों के सार से परिचित होकर अविद्या से दूर विद्यावान् बनता है। सत्यार्थप्रकाश अपने नाम के अनुरूप मनुष्य अपने पाठक को सत्य और असत्य का स्वरूप प्रकाशित कर अविद्या को छुड़ाता है तथा विद्या से जोड़ता वा मनुष्य को ज्ञानी बनाता है। विद्या सुख का पर्याय है और अविद्या दुःख का। विद्या से अमृत व मोक्ष की प्राप्ति होती है और अविद्या से मनुष्य अज्ञान व आत्मा को अन्धकार से युक्त कर उसे कर्तव्य बोघ में बाधक बनाता है। विद्या से ही हमारे ऋषि मुनि व राम, कृष्ण तथा दयानन्द सदृश महापुरुष संसार के आदर्श बने थे और आज भी हैं। आज का युग पक्षपात, अन्याय व शोषण का युग है। लोग सत्य और असत्य को जान लेने पर भी सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग नहीं करते हैं। यही कारण है कि संसार में अविद्या पर आधारित मत-मतान्तरों का उच्छेद नहीं हो पा रहा है और ऐसा न होने से ही वेदों का प्रचार व उनका देशवासियों द्वारा ग्रहण नहीं हो पा रहा है। यदि ऐसा हो जाये तो देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने सहित संसार का, जीवन के उद्देश्य व लक्ष्यों को प्राप्त करने में, मार्गदर्शन कर सकता है। आज स्थिति विपरीत है। हमारे देश के लोग स्कूली शिक्षा प्राप्त कर विदेशों में धन कमाने के लिये दौड़ते हैं और देश व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भी विस्मृत कर देते हैं। जिस देश की मिट्टी में वह जन्में, पढ़े तथा बढ़े हैं उसे भूल कर विदेशियों के अपने हो जाते हैं। व्यवस्था में भी ऐसे लोगों को अधिक सम्मान दिया जाता है।

देश में अविद्या के होने से लोग अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक न होने से पुरुषार्थ नहीं कर पाते। किसी भी देश में शिक्षा सभी देशवासियों का मौलिक अधिकार होना चाहिये परन्तु हमारे देश में धनवान लोग ही शिक्षा वा उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। आम व्यक्ति तो मात्र प्राथमिक शिक्षा व सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्राप्त कर ही सन्तोष कर लेता है। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबन्धन व ऐसी शिक्षायें इतनी महंगी हैं कि एक कुशाग्र निर्धन व्यक्ति प्रतिभावान होकर भी अपनी इच्छा व प्रतिभा के अनुसार विद्या व ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। कई लोगों को तो पारिवारिक कारणों से बचपन से ही मजदूरी वा श्रम करना पड़ता है। देश की आजादी के 72 वर्षों में भी सरकारें निर्धनों के लिये अनिवार्य शिक्षा तथा प्रतिभावान युवाओं के लिये उच्च शिक्षा का प्रबन्ध नहीं कर सकीं। हमारी स्कूली शिक्षा में भी अनेक खामियां हैं। स्कूली शिक्षा से कोई मनुष्य ऋषि, राम व कृष्ण नहीं बन सकता। वह यदि बनेगा तो बाबू या इसी प्रकार का कोई सामान्य कार्य ही कर सकता है। स्कूली शिक्षा प्राप्त कोई भी मनुष्य ईश्वर जीवात्मा के अस्तित्व को यथार्थ रूप में नहीं जानता है। इसके विपरीत साधारण हिन्दी जानने वाला मनुष्य सत्यार्थप्रकाश पढ़कर और आर्यसमाज में विद्वानों के उपदेश सुनकर आध्यात्म और सामाजिक ज्ञान को कहीं अधिक प्राप्त कर एक आदर्श जीवन व्यतीत कर सकता है। आधुनिक स्कूली शिक्षा में नैतिक शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता। इसके विपरीत ऋषि दयानन्द का प्रत्येक अनुयायी जानता है कि यम व नियम क्या हैं और इनका महत्व क्या है। वह यह भी जानता है इनको व्यवहारिक रूप देने से जीवन में क्या लाभ मिलता है। ईश्वर की उपासना कैसी की जाती है और इससे क्या लाभ होता है, इसका ज्ञान भी आर्यसमाज के प्रत्येक अनुयायी को होता है। हम अपने बारे में भी सोचते हैं कि यदि हम आर्यसमाज में न जाते होते तो आज हमारा ज्ञान केवल किताबी ज्ञान तक सीमित होता। हम न तो सन्ध्या व अग्निहोत्र से परिचित होते, न योग से, न प्राणायाम से और न ही सामाजिक सम्बन्धों के महत्व से। वेद और विद्या का परस्पर गहन अटूट सम्बन्ध है। बिना वेदाध्ययन ऋषि के ग्रन्थों के अध्ययन से कोई मनुष्य विद्यावान वा विद्वान नहीं बन सकता। ऐसा होने पर वह अपने जीवन के उद्देश्य लक्ष्य को पूर्ण आंशिक रूप से तो जान ही सकता है और ही उन्हें प्राप्त ही कर सकता है।

समाज में यदि अज्ञान अन्धविश्वास हों तो ऐसा समाज उन्नति नहीं कर सकता। यही कारण था कि ऋषि दयानन्द ने हिन्दू समाज में व्याप्त मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, जन्मा जातिवाद, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, गंगा स्नान की महिमा, समाज में छुआछूत तथा ऊंच व नीच की भावना तथा अनेकानेक भेदभावों पर गहन विचार व मंथन किया और इन सब को सत्य ज्ञान का पर्याय वेदों का विरोधी पाया। इन्हीं कारणों से हम महाभारत काल के बाद अवनति व पतन की ओर अग्रसर रहे। मुसलमान व ईसाई शासकों के गुलाम बने और इसी कारण हमें पाकिस्तान व बंगलादेश आदि अपने भूभाग को अपने विरोधी मत के लोगों को देना पड़ा और आज भी देश में शान्ति नहीं है। कश्मीर में जो नरसंहार हुए हैं तथा विभाजन के समय के नरसंहार इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं। इनका कारण यही अविद्या अन्धविश्वास वा समाज में पाखण्ड आडम्बरों का प्रचलन था। अतः ऋषि दयानन्द ने समाज सुधार पर सबसे अधिक ध्यान दिया। सत्यार्थप्रकाश का ग्यारहवां, बारहवां, तेरहवां तथा चौदहवां समुल्लास इसी दृष्टि से मनुष्य को अज्ञान अविद्या से मुक्त कराकर समाज सुधार का कार्य करने की भावना का परिचायक हैं। ऋषि दयानन्द के कार्यों का विश्वव्यापी प्रभाव हुआ है। विधर्मियों ने अपने मत की मान्यताओं में संशोधन व उनकी व्याख्याओं को ऋषि दयानन्द की आपत्तियों के प्रकाश में देखा और उन्हें तर्कसंगत बनाने का प्रयत्न किया परन्तु ऐसा किया जाना सम्भव नहीं था। आज भी समाज सुधार का कार्य अधूरा व अपूर्ण है। आर्यसमाज में अब पुराने विद्वान व शास्त्रार्थ महारथी तथा असत्य मान्यताओं का खण्डन करने वाले विद्वान परलोक जा चुके हैं और जो वर्तमान में विद्वान हैं वह केवल आर्यसमाज मन्दिरों में अग्निहोत्र यज्ञ तथा आध्यात्मिक प्रवचनों तक ही सीमित हैं। इस कारण से समाज सुधार का कार्य प्रायः बन्द है।

वर्तमान स्थिति तो ऐसी है कि आर्यसमाज के अनुयायी अपने परिवारों व बच्चों को वैदिक धर्म की मान्यताओं पर चलाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं क्योंकि समाज में पाश्चात्य विचारों व अपसंस्कृति का प्रचार बढ़ रहा है। इस कारण आर्यसमाज के भविष्य पर विचार करने पर अनेक विद्वानों को निराशा मिलती है। हम व हमारे विद्वान मित्र भी इस कारण से चिन्तित रहते हैं। यह स्थिति ऐसी है कि इससे ईश्वर ही आर्यसमाज, देश व समाज को बाहर निकाल सकता है। वेद ईश्वर का ज्ञान है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक है। अतः वेद की प्रतिष्ठा होना ईश्वर की प्रतिष्ठा का पर्याय है। ईश्वर को ही इस दिशा में कुछ चमत्कारिक कार्य करना है जिससे वैदिक धर्म संस्कृति की रक्षा हो सके। अतीत में ईश्वर ने ऋषि दयानन्द को भेज कर वैदिक धर्म संस्कृति की रक्षा की थी। आज की परिस्थितियां कुछ अर्थों में पहले से भी खराब हैं। आर्यसमाज को भी लोकैषणा, वित्तैषणा तथा पुत्रैषणा सहित अपने स्वार्थों पदलिप्सा को दूर करना होगा। जिस तरह से बीज भूमि को अपना पूरा-पूरा समर्पण किये बिना नये पौधे व वृक्ष को जन्म नहीं दे सकता, इसी प्रकार से हमारे प्रौढ़ एवं वृद्ध लोगों को करना है। पता नहीं वह सुधर सकेंगे या नहीं, कहा नहीं जा सकता। यह ईश्वर का काम है और उसी से हम प्रार्थना करते हैं कि वह वेदों की रक्षा, धर्म रक्षा, आर्यत्व तथा वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिये आर्यों, वैदिक धर्मियों, हिन्दुओं व अन्य मतों के निष्पक्ष विद्वानों को प्रेरणा करें। ऋषि दयानन्द ने तो अपने समय में सनातन वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा वेद प्रचार और अविद्या के नाश के कार्यों सहित समाज सुधार के कार्यों के द्वारा की थी। आज पुनः देश में वैदिक धर्म एवं संस्कृति संकुचित होती दीखती है। ईश्वर इसका अवश्य कुछ न कुछ समाधान करेंगे, यही आशा वैदिक धर्मी कर सकते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

परिचय - मनमोहन कुमार आर्य

नाम मन मोहन कुमार आर्य है. आयु ६३ वर्ष तथा देहरादून का निवासी हूँ। विगत ४५ वर्षों से वेद एवं वैदिक साहित्य सहित महर्षि दयानंद एवं आर्य समाज के साहित्य के स्वाध्याय में रूचि है। कुछ समय बाद लिखना आरम्भ किया था। यह क्रम चल रहा है। ईश्वर की मुझ पर अकथनीय कृपा है।