गीतिका/ग़ज़ल

प्रेम धारा सरस् तुम बहाया करो

दिल हमारा न ऐसे दुखाया करो –
सब्र मेरा न यूँ आजमाया करो |
बेरुखी की तपिश से जले आशियाँ –
प्रेम धारा सरस तुम बहाया करो |
प्यार की रौशनाई में भीगे हुये-
जुगनुओं की तरह जगमगाया करो |
तोड़ कर हर रवायत की बंदिश सनम –
बस मोहब्बत का वादा निभाया करो |
अपनी उल्फत लुटाते रहे गैर पर-
कुछ हमारे लिए मुस्कुराया करो |
दिल की धड़कन के हर राग में हो तुम्ही –
रागनी बन के बस गुनगुनाया करो |
दर्द दे दो सनम लाख चाहें मगर –
रूठ कर दूर हमसे न जाया करो |
इश्क करना नहीं है बुरा जानिये-
हो गया इश्क गर तो निभाया करो |
दिल ही दिल में दबाये रहे प्यार को
राजे उल्फत ज़रा कुछ बताया करो |
झर रही है झरी आज सावन की ज्यों
बस मोहब्बत भी ऐसे लुटाया करो |
मेरी चाहत हो तुम हर खुशी हो मेरी –
दिल किसी और से मत लगाया करो |
मन मंजूषा भरी है ‘मृदुल’ प्रीत से-
प्रीत की रीत हमदम निभाया करो |

©®मंजूषा श्रीवास्तव’मृदुल’

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016