महाराष्ट्र की राजनीति में नये सूरज का उदय : हिंदुत्व के साथ महा विश्वासघात

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद मची जबर्दस्त उथल-पुथल अब शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही समाप्त हो चुकी है तथा इस बीच सरकार गठन को लेकर जिस प्रकार की पैतरेंबाजी राजनैतिक दलों की ओर से दिखायी गयी अब उसका असर भी काफी समय के लिए शांत हो गया है। अभी समाचार चैनलों में तथा राजनैतिक कालमों में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार की स्थिरता को लेकर लंबी बहस की जा रही है तथा यह आगे भी जारी रहेगी। जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि तीनों ही दलों की विचारधारा बिलकुल विपरीत है। महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश की जनता ने देखा है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे राज्य में अपनी पहली सरकार बनवाने के लिए किस प्रकार से अड़ गये। पहले उन्होंने भाजपा के साथ ढाई-ढाई साल की झूठ पर आधारित सौदेबाजी करनी चाही और अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहे थे, साथ ही वे भाजपा के धुर विरोधी दलों के साथ बैठकें भी करने लग गये थे। अब वे मुख्यमंत्री बन चुके हंै तथा किसी एक दल द्वारा मैच हारने के बाद अब अगर और मगर शब्दों की महत्ता भी समाप्त हो चुकी है।
संपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में यदि किसी का सबसे नुकसान हुआ है तो वह है भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्व की राजनीति का और सबसे बड़ा नुकसान हुआ है सिद्धांतों का। भाजपा के हाथ से एक बहुत बड़ा राज्य निकल चुका है यह एक बेहद कडव़ी सच्चाई है, जिसका असर पूरे भारत की राजनीति पर काफी समय तक पड सकता है। महाराष्ट्र की बदली हुई राजनीति से यह बात साफ हो गयी है कि राजनैतिक दल और नेता अपने दल तथा परिवार की भलाई के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हंै।
सत्ता के लिए शिवसेना ने हिंदुत्व का त्याग कर दिया है और अब वह सेकुलर हो गयी है। शिवसेना सरकार का शपथ ग्रहण महाराज शिवाजी का सिंहासन सामने रखकर और उनको फूलमाला पहनाने के साथ संपन्न हुआ है। अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही शिवाजी के किले के रखरखाव के 20 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है। अभी तक यही शिवसेना गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा के निर्माण व भारी भरकम खर्च का विरोध कर रही थी। शिवसेना ने एनसीपी व कांग्रेस के साथ जाकर हिंदू जनमानस की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। आज शिवसेना अपने पत्र सामना में भाजपा के खिलाफ जमकर जहर उगल रही है तथा अपने जश्न में वह यह भूल गयी है कि अगर आज शिवसेना अपना मुख्यमंत्री बनवाने में सफल हुई है तो उसके पीछे भी भारतीय जनता पार्टी व संघ का ही सहयोग रहा है।
शिवसेना ने हिंदुत्व के साथ महा विश्वासघात किया है। शिवसेना की अभी बहुत कड़ी अग्निपरीक्षा होने जा रही है। अब शिवसेना को संसद में जम्मू कश्मीर, राम मंदिर, बांग्लादेशी घुसपैठ, एनआरसी, जनसंख्या नियंत्रण, राष्ट्रवाद व पाकिस्तान व आतंकवाद के खिलाफ कड़ी व निर्णायक लड़ाई पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए शरद पवार और कांग्रेस आलाकमान के सामने नतमस्तक होना पड़ेगा।
शिवसेना ने हिंदू जनमानस के साथ बहुत गहरा आघात किया है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने के लिए गांधी परिवार के दरबार में जाकर झुक गये। वह बहुत ही हसीन दावा कर रहे हें कि उन्होंने दिल्ली के आगे घुटने नहीं टेके। लेकिन वह यह नहीं बताते हैं कि दिल्ली में ही श्रीमती सोनिया गांधी का परिवार रहता है और उनके यहां पर मत्था टेकने कौन गया था कि मुझे मुख्यमंत्री बना दो। वह अपने आप को सेकूलर बनाने के लिए अयोध्या का दौरा टाल देते हैं और अजमेर शरीफ की दरगाह पर चले जाते हैं। आखिर क्यों?
शिवसेना प्रमुख उद्धव जी को एक बात पर बहुत गौर करना चाहिए लेकिन अब वह सत्ता के नशे में उसे नहीं समझ पायेंगे। शिवसेना ने तो अपना हिंदुत्व छोड़ दिया है लेकिन क्या कांग्रेस व एनसीपी ने अपना मुस्लिम तुष्टीकरण का राग छोड़ दिया है, संभवत नहीं।
सोनिया कांग्रेस ने बहुत ही चालाकी के साथ शिवसेना को भाजपा से दूर किया, हिंदुत्व की विचारधारा से दूर किया और भाजपा को रोकने में सफलता हासिल की लेकिन वह स्वयं और उनके पूरे परिवार ने उद्धव जी के शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाकर अपने मुस्लिम वोटबैंक का नुकसान होने से अपने आपको बचा लिया। अब रही बात सरकार की लंबी स्थिरता की। अभी केंद्र में मोदी सरकार मजबूत है तथा अवसर आते ही अब वह हिंदू कार्ड और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को बहुत तेजी व आक्रामक गति से उठाना शुरू कर सकती है। मराठा गलतियों से भाजपा नेतृत्व बहुत अधिक चिंतित व मंथन भी करने लग गया है कि इन परिस्थितियों को किस प्रकार से नियंत्रण में लाया जाये। भाजपा आलाकमान निश्चय ही बहुत दबाव में है। वह दबाव से निकलने के लिए कुछ न कुछ क्रांतिकारी कदम अवश्य उठा सकता है। पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान से मुक्त कराने और अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण की घोषणा के समय शिवसेना की अग्निपरीक्षा होगी।
यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पायेगी या नहीं अभी कुछ भी कयास लगाना कठिन है। गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी कांग्रेस पार्टी ही है। विगत 70 साल में केंद्र से लेकर किसी भी राज्य में कांग्रेस ने किसी भी गैर कांग्रेसी दल की सरकार को अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया है। केंद्र में वीपी सिंह से लेकर मोरारजी देसाई, चैधरी चरण सिंह, आईके गुजराल, देवगौड़ा तथा चंद्रशेखर की सरकारों को किस प्रकार से कांग्रेस ने तोड़ा यह देश के सभी राजनैतिक इतिहासकार व नेता जानते हैं। अभी हाल ही में कर्नाटक की सरकार गिरवाने में कांग्रेस के ही विधायकोें की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। कांग्रेस ने देश के सभी राज्यों में सरकारों को स्थिरता प्रदान करने का खेल कम उन्हें गिराने का काम अधिक किया है।
कांगे्रस को किसी भी कीमत पर गैरकांग्रेसी दल का उत्थान पसंद नहीं है। गांधी परिवार सरकार के शपथ समारोह में नहीं गया, यहीं से उसने अपने लिए भविष्य का रास्ता छोड़ रखा है। राहुल व प्रियंका को किसी भी कीमत पर पांच साल तक उद्धव पसंद नहीं आयेंगे। एनसीपी नेता शरद पवार का मस्तिष्क भी अस्थिरता वाला ही है। अजीत पवार के रूप में एक कमजोर कड़ी वहां भी बन चुकी है। क्या अजीत पवार यदि उपमुख्यमंत्री नहीं बनाये जाते हैं तो वह लंबे समय तक चुप बैठे रहेंगे? महाराष्ट्र में शिवसेना ने सरकार बना ली अब वह उसे चलाकर दिखाये। अब उसे सरकार व योजनाओं को चलाने के लिए केंद्र सरकार के ही पास फिर से जाना होगा। केवल अपनें बूते वह किसानों का सारा कर्ज माफ नहीं कर सकते। मराठा युवाओं को नौकरी नहीं दे सकते। अब पूरा देश यह देखना चाह रहा है कि शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे का हिंदू जनमानस को उद्वेलित करने वाले मुददों पर कैसा रवैया रहता है। कांग्रेस व एनसीपी की अपनी विचाराधारा पूरी तरह से स्पष्ट है तथा उन्होंने उसे छोड़ा नहीं है केवल और केवल शिवसेना ने हिंदुत्व की विचारधारा को कुरान व चर्च के समक्ष गिरवी रख दिया है। अब अगर महाराष्ट्र की राजनीति के कारण हिंदू जनमानस को दुःख पहुंचा तो उसका सारा पाप उद्धव ठाकरे पर ही आयेगा, बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर नहीं।
शिवसेना बार-बार बाला साहेब का नाम लेती है लेकिन उन्होंने कभी भी कांग्रेसी विचारधारा के आगे घुटने नहीं टेके। यह वही कांग्रेस है जिसने कभी बाला साहेब का मतदान का अधिकार छीन लिया था और उन्हें निरपराध जेल भेजा था। आज कांग्रेस पार्टी केवल उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाकर अपना जीत का जश्न मना रही है। उसके नेता भी विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि मजबूत और धुर विरोधी बाला साहेब ठाकरे का बेटा उनकी गोद में बैठने को लालायित हो रहा है। यह सरकार अपना कार्यकाल केवल गांधी परिवार की ही दया पर चल सकेगी। जिस दिन उनका ध्येय पूरा हो जायेगा वह उन्हें मझधार में ही गिराकर चली जायेगी। कांग्रेस के पास सरकार गिराने के लिए बहुत तरकीबें रहती हैं तथा उसने इसमें पीएचडी की है।
— मृत्युंजय दीक्षित