महाराष्ट्र में खिचड़ी सरकार को ५ साल टिकने की चुनौती

शिवसेना ने मोदी के नाम पर वोट हासिल कर ५६ सीट पर जीत प्राप्त कर लेने के बाद बीजेपी से ३० साल पुराना गठबंधन तोड़ हाल ही में खिचड़ी सरकार बना ली है . कांग्रेस , एनसीपी , शिवसेना और निर्दलीय मिलकर १६९ विधायकों के समर्थन से उद्धव ठाकरे सरकार महाराष्ट्र में राज कर रही है |अपने भाषण में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे जी ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र जी को अपना मित्र बताया और कहा ही पहली बार पक्ष और विपक्ष में सभी मित्र है कोई विपक्ष है ही नही . लेकिन ये सब शिवसेना की भविष्य को लेकर रणनीति का एक हिस्सा है | शिवसेना का लगातार खिसकता जनाधार उसे दूर कर स्थिर होने और अपना पुराना रौब वापस पाने की रणनीति हो सकती है यह |
अगर भाजपा २८८ सीट पर अकेले चुनाव लढती तो इसकी पूरी सम्भावना थी की भाजपा १४५ के आंकड़े को पार कर जाती अगर ५-१० सीटे कम भी रहती तो निर्दलीयों की सहायता से सरकार बन जाती और शिवसेना यहाँ पर मनसे की तरह साफ़ हो जाती | विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 164 और शिवसेना को 124 सीटों पर किस्मत आजमानी थी ? इतनी सीटों पर लड़ने के बावजूद भाजपा का जीत प्रतिशत शिवसेना से बेहतर रहा । एनडीए में रहना अब शिवसेना की मजबूरी थी । महाराष्ट्र की राजनीतिक सत्ता का फैसला 2014 में हो गया था । सन 2009 में ही भाजपा को विधानसभा में शिवसेना से ज्यादा सीटें मिल गईं थीं और नेता विपक्ष का पद भाजपा ने हासिल कर लिया था । पर वर्चस्व स्थापित किया 2014 के चुनाव में । इस चुनाव के बाद बनी सरकार में शिवसेना को महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं दिए गए । उनके मंत्रियों की फाइलों को लेकर सवाल किए गए । भाजपा नेताओं ने ‘मातोश्री’ जाकर राय-मशविरा बंद कर दिया । शायद यह सब सोच-समझकर हुआ, ताकि शिवसेना को अपनी जगह का पता रहे । सन 2017 के बृहन्मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में भाजपा और शिवसेना करीब-करीब बराबरी पर आ गईं । शिवसेना का क्षरण क्रमिक रूप से हो रहा था । उसके नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने लगे ।
कहा जा रहा है कि शरद पवार ने उद्धव ठाकरे को यह समझाने का प्रयास किया है कि भाजपा की छत्रछाया में शिवसेना का विकास नहीं होगा । अब चूंकि शिवसेना ने एक बड़ा फैसला कर ही लिया है, तो उसकी तार्किक परिणति का हमें कुछ समय तक इंतजार करना होगा । विधानसभा चुनाव में अपनी दोयम स्थिति को स्वीकार करके उसने अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कोशिश की थी । एक समय तक महाराष्ट्र में बड़े भाई की भूमिका में रहने के बाद पार्टी को बेमन से छोटे भाई की भूमिका में आना पड़ा । इसके साथ ही उसने एनडीए में रहने के बावजूद भाजपा के कदमों और निर्णयों की आलोचना शुरू कर दी । उद्धव चाहते हैं कि उनका पुत्र ठीक से स्थापित हो जाए । दिक्कत यह है कि उद्धव ठाकरे के पास बालासाहेब ठाकरे जैसा व्यक्तित्व नहीं है । बालासाहेब छोटे भाई बनकर नहीं रहे, पर उद्धव ठाकरे को बनना पड़ा ।
क्या अब शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस की छत्रछाया में विकसित होगी? या ये दोनों पार्टियां शिवसेना की छत्रछाया में अपने अस्तित्व की रक्षा करेंगी ? अस्तित्व-रक्षा के इस यज्ञ में कई प्रकार के निजी हित टकराते हैं । महाराष्ट्र राज्य देश के आर्थिक क्रिया-कलाप का केंद्र है । नेताओं के ही नहीं कारोबारी व्यक्तियों के हित भी इस राज्य से जुड़े हैं । शरद पवार केवल किसानों के हितैषी ही नहीं हैं, वे देश के उद्योग-व्यापार के संरक्षक भी हैं । पर इस शतरंज की बिसात का मायाजाल बहुत जटिल है । बहरहाल इस दौर में बाजी उनके हाथ में लगी है । महाराष्ट्र की जनता भी खासी नाराज है जो पारंपरिक वोटर्स है वो ज्यादा नाराज है कांग्रेस के और जिन्होंने मोदी जी को देखकर शिवसेना को वोट दिया वो भी खासे नाराज है | अगर इन ५ साल के अंदर अगर फिर से चुनाव होते है तो महाराष्ट्र में फिर से खिचड़ी सरकार नहीं बनेगी इस बात की पक्की सम्भावना है |

परिचय - महेश गुप्ता

नागपुर से हूँ. एक आईटी कंपनी में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत हूँ . मेरा मोबाइल नंबर / व्हाट्स अप्प नंबर ८६६८२३८२१० है. मेरा फेसबुक पेज https://www.facebook.com/mahesh.is.gupta