कविता

मानव

कहने भर को मानव
बन तो गया मानव
ओढ़ आधुनिकता का
मुखौटा
पर काम सारे करता
आदिमानव जैसे
रहता ऊँची ऊँची
इमारतों में
घूमता बड़े बड़े मालों
पांच सितारा होटलों
विदेशों में
पर जब आती बात
साफ सफाई की
तो हर जगह बिखेरता
गंदगी कागज़, सिगरेट, बोतलें
जिस से होती हवा पानी
साँसे सब दूषित
सरकारें भी कुछ कम नहीं
हमारी
हर मसले पर होती बस
राजनीति
दे नारे नारे बड़े बड़े
पर होता कुछ नहीं
कोई सुधार कहीं
बस खोखले दावों से
रहते उलझाए हम सबको
न खुद व्यक्ति
न खुद समाज
न खुद राजनीतिक पार्टीयां
करती कोई सोच विचार
दिलाने को मुक्ति
इस दमघोटू प्रदूषण से
हरे भरे पेड़ भी दें कैसे
स्वच्छ हवा
जब पड़ा रहेगा कचरा इतना
कब जागेंगे सब
और मिलेगी मुक्ति
हम सबको
जहरीली हवा
दूषित पानी
विस्फोटक प्लास्टिक
और बनेगा जीवन खुशहाल
 प्रदूषण मुक्त
देख रही हर आँख, दिल, साँस सपना यही ।।
— मीनाक्षी सुकुमारन

परिचय - मीनाक्षी सुकुमारन

नाम : श्रीमती मीनाक्षी सुकुमारन जन्मतिथि : 18 सितंबर पता : डी 214 रेल नगर प्लाट न . 1 सेक्टर 50 नॉएडा ( यू.पी) शिक्षा : एम ए ( अंग्रेज़ी) & एम ए (हिन्दी) मेरे बारे में : मुझे कविता लिखना व् पुराने गीत ,ग़ज़ल सुनना बेहद पसंद है | विभिन्न अख़बारों में व् विशेष रूप से राष्टीय सहारा ,sunday मेल में निरंतर लेख, साक्षात्कार आदि समय समय पर प्रकशित होते रहे हैं और आकाशवाणी (युववाणी ) पर भी सक्रिय रूप से अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं | हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रहों .....”अपने - अपने सपने , “अपना – अपना आसमान “ “अपनी –अपनी धरती “ व् “ निर्झरिका “ में कवितायेँ प्रकाशित | अखण्ड भारत पत्रिका : रानी लक्ष्मीबाई विशेषांक में भी कविता प्रकाशित

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