इतिहास

महाराजा सूरजमल जाट

पं० मदन मोहन मालवीय ने सन् 1932 में दिल्ली में एक भव्य मन्दिर बनवाने की सोची। जिसे हम लक्ष्मी नारायण मन्दिर के नाम से आज जानते हेँ।
इसकी आधारशिला के अवसर पर भारत वर्ष के राजा-महाराजाओं को पधारने का न्यौता दिया गया। काफी राजा महाराजा सज-धजकर इस अवसर पर दिल्ली पहुंचे। जब आधारशिला रखने की बारी आई तो महामहिम मालवीय जी दुविधा में पड़ गए कि किस राजा से इस पवित्र मन्दिर की स्थापना की जाए? उन्होंने बहुत सोच विचार कर एक प्रस्ताव तैयार किया, जिसमें उन्होंने 6 शर्तें रखीं कि जो भी राजा इन शर्तों को पूरा करेगा वही इस मन्दिर की आधारशिला अर्थात् नींव का पत्थर रखेगा। ये शर्त थीं।
क) जिसका वंश उच्चकोटि का हो।
ख) जिसका चरित्र आदर्श हो।
ग) जो शराब व मांस का सेवन न करता हो।
घ) जिसने एक से अधिक विवाह न किये हों।
ङ) जिसके वंश ने मुगलों को अपनी लड़की न दी हो।
च) जिसके दरबार में वेश्याएँ न नाचती हों।
इस प्रस्ताव को सुनकर राजाओं में सन्नाटा छा गया और जमीन कुरेदने लगे। धौलपुर नरेश महाराजा उदयभानु सिंह जाट अपने स्थान से उठे जो इन सभी 6 शर्तों पर खरे उतर रहे थे। इस पर पं० मदन मोहन मालवीय ने हर्ष ध्वनि से उनके नाम का उदघोष किया तो शोरम गांव जिला मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश के जाट पहलवान हरज्ञान ने ‘नरेश धौलपुर जिन्दाबाद’ के नारे लगाये। इस पर मालवीय साहब ने कहा, महाराजा धौलपुर उदय भानुसिंह राणा धौलपुर नरेश हमारे देश की शान हैं। इसके बाद पूरी सभा नारों से गूंज उठी। क्योंकि इन सभी शर्तों को पूर्णतया पूरी करने वाले वही एकमात्र राजा थे जो वहां पधारे थे।
इस जाट नरेश का नाम मन्दिर के प्रांगण में स्थापित शिलालेख पर इस प्रकार अंकित है।
श्री लक्ष्मी नारायण मन्दिर – श्री महामना मालवीय पं० मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से मन्दिर की आधारशिला श्रीमान उदय भानुसिंह धौलपुर नरेश के कर कमलों द्वारा चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या रविवार विक्रमीय सम्वत् 1989 (अर्थात् सन् 1932) में स्थापित हुई।
जाट नरेश का नाम व चित्र मन्दिर के बाएं बगीचे में संगमरमर के एक पत्थर पर अंकित है। राजस्थान की मुख्यमन्त्री श्रीमती वसुंधरा राजे इसी महाराजा उदयभानु जाट के राजकुमार से ब्याही थी जो बड़े गर्व से कहती हैं – “वह वीर जाटों की बहू है।”
मेरी समझ से भारत के हर समुदाय का इतिहास गौरवमयी और देशहित में है। बशर्ते उस इतिहास को दूषित ना किया जाए। या फिर मिशनरियों ने दूषित ना किया हों।।

अटल बिहारी वाजपेई जब देश के प्रधानमंत्री थे उस समय सन 2003 में एक शिष्टमंडल इराक गया था उस शिष्टमंडल में सांसद सोमपाल शास्त्री भी थे और तब इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन थे परिचय के दौरान जब सोमपाल शास्त्री ने अपना नाम बताया तो सद्दाम हुसैन ने शास्त्री लगा होने के कारण पूछा कि क्या आप पंडित हो तब सोमपाल शास्त्री ने कहा कि नहीं मैं जाट हूं तब सद्दाम हुसैन ने खड़े होकर उसे गले लगाया और बताया कि मैं भी खोखर गोत्र का जाट ही हूं और उस शिष्टमंडल को इराक के सरकारी आवास में ठहराया गया जबकि सोमपाल शास्त्री को सद्दाम हुसैन अपने महल में लेकर गया और रात को वही पर रखा सुबह जब शिष्टमंडल के एक मुस्लिम सदस्य ने सद्दाम हुसैन से मजाक में ही पूछा कि ऐसा क्या कारण था कि मुस्लिम होने के बाद भी आप मेरे को महल मे लेकर नहीं गये और हमारे शिष्टमंडल के एकमात्र सदस्य सोमपाल शास्त्री को ही आप महल में लेकर गए सद्दाम हुसैन ने कहा था कि धर्म एक पूजा पाठ का जरिया मात्र है और जब चाहो इस को बदल सकते हो लेकिन हमारा और इनका रिश्ता खून का रिश्ता है जो कभी बदल नहीं सकता यह बात सोमपाल शास्त्री ने खुद 2007 अंतर्राष्ट्रीय जाट सम्मेलन दिल्ली में कही थी।

बात उस समय से है जब दिल्ली के मुगल बादशाह ने हिन्दुओं के पवित्र शहर पुष्कर के मेले और स्नान पर रोक लगा दी थी।

यह बात भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल की माताजी को पता चली तो उसने अपने बेटे महाराजा सूरजमल जाट को पुष्कर का स्नान करने की इच्छा जताई । महाराजा सूरजमल ने बिना कुछ सोच विचार किए अपनी मां को पुष्कर स्नान करवाने का वचन दे दिया । तब सूरजमल के सभी मंत्रियों और शुभचिंतकों ने सूरजमल को ऐसा न करने की सलाह दी और अपने फैसले पर पुर्नविचार करने की बात कही । तब सूरजमल ने कहा कि- “अगर मां ने स्नान की इच्छा जताई है तो स्नान जरूर होगा । और जो काम करना है तो करना है उसके लिए सोचना की आवश्यकता नहीं ।”

तब सूरजमल महाराज अपनी मां को अपनी एक बलशाली योद्धाओं की सेना टुकड़ी लेकर भरतपुर से पुष्कर के लिए रवाना हुआ । भरतपुर से पुष्कर के बीच में पडने वाली सभी मुस्लिम रियासतों ने सूरजमल को रोकने का प्रण किया । लेकिन- सूरजमल के रास्ते में जो भी मुस्लिम रियायत आती , जो भी मुगल सेना आती उसे काटते – चिरते हुए सूरजमल अजेय होकर आगे बढ़ता रहा । सूरजमल मुस्लिम शासकों की सेना की लाशें बिछाता हुए पुष्कर तक पहुंच गया और अपनी मां को स्नान करवाया ।

ऐसे ही वापिस लौटते वक्त मुसलमानों ने सूरजमल को रोकने की भरतपुर कोशिशें की लेकिन सूरजमल जैसे मुसलमानों को चीरता हुआ गया था ऐसे ही एक एक मुसलमान रियासत को चीरता हुआ भरपूर वापिस लौट आया । वापिस लौटकर सूरजमल महाराज ने दिल्ली मुगल बादशाह को पत्र लिखा…
कि-
“मुसलमानों में कोई ऐसा वीर नहीं जो हिन्दुओं को पुष्कर मेले में स्नान करने से रोक पाए । अबकी बार तो मेरी माता जी पुष्कर नहाई हैं, अगली बार भरतपुर का हर हिन्दू पुष्कर में स्नान करने के लिए जाएगा । पहले ही बता दिया है, अभी से सूरजमल को रोकने की तैयारी में लग जाओ ।”

यह पत्र पढ़कर दिल्ली के बादशाह ने शर्म से पानी पानी होकर अपना हुक्म वापिस ले लिया।

इस घटना पर इतिहासकार लिखते हैं कि-
“संपूर्ण भारत के पूरे इतिहास में यह हिन्दू राजा द्वारा मुसलमानों पर किया गया सबसे भयानक आक्रमण था, जब एक हिन्दू राजा ने एक, दो नहीं अपितु अनेकों मुस्लिम रियासतों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें चीरता हुआ अपने गंतव्य स्थल तक जा पहुंचा और चीरता हुआ अपने राज में वापिस आ गया।”

पानीपत फिल्म में इतिहास से छेड़छाड़ !

महाराजा सूरजमल जी ने आगरा या दिल्ली को लेकर साथ नहीं छोड़ा था। पानीपत फ़िल्म में गलत दिखाया गया है।

महाराजा सूरजमल व भाऊ के बीच मतभेद हुए थे। कई बार रणनीति को लेकर व भाऊ की कई गलतियों पर महाराजा सूरजमल जी ने उसे टोक दिया था जिससे भाऊ चिढ़ गये थे। दिल्ली विजय तक ये मतभेदों के साथ ही एक साथ रहे परन्तु दिल्ली विजय के बाद दोनों में मतभेद बढ़ते गए और भाऊ ने उन्हें बन्दी बनाने की योजना बना ली थी। तब होलकर, सिंधिया ने यह बात महाराजा सूरजमल जी को बताई और उन्हें वहां से जाने का आग्रह किया।

अगर भाऊ महाराजा सूरजमल जी को बन्दी बनाने की भी योजना न बनाते तो परिणाम कुछ और ही होते। यदि उनकी रणनीति भी मान लेते तो भी भाऊ अकेले जीत जाते। महाराज सूरजमल ने अपनी रणनीति से इससे पहले 57 में अबदाली को मथुरा वृन्दावन भरतपुर से निकाला था। वो भी अकेले ही। बाद में हार के कारण वही रहे जिन्हें मराठो को महाराजा सूरजमल सुधारने के लिए बोल रहे थे।

महाराजा सूरजमल ब्रिज क्षेत्र से थे। उनकी भाषा ब्रिज व हिंदी थी लेकिन उन्हें मजाकिया तरीके से अलग भाषा बोलते दिखाया गया है। जबकि मराठे जो आज भी हिंदी बहुत कम बोलते हैं। उस समय तो उन्हें हिंदी आती ही न थी फिर भी उन्हें हिंदी बोलते दिखाया गया है और गम्भीर दिखाया गया है। आखिर यह दोगलापन क्यों?

महाराजा सूरजमल जी का कद साढ़े 6 फिट से ऊपर था और डील डोल वाला शरीर था। जबकि महाराष्ट्र में आज भी देख सकते हैं कि हाइट उत्तर भारत की तुलना में बहुत कम है। फिर भी उनका कद उनसे कम दिखाया गया। महाराजा सूरजमल जी का बोलना और तरीका रौबीला व तेवर वाला था। लेकिन उन्हें गलत तरीके से दिखाया गया उनके सिर पर पगड़ी तक न रखी गयी। ऐतिहासिक तथ्य हो या उनका चरित्र चित्रण दोनो में फ़िल्म वाले ने द्वेषपूर्ण जानबूझकर उन्हें गलत दिखाया गया है।

महाराज सूरजमल जी ने 57 में अबदाली को भगाया तब भी मराठे साथ न आये। लेकिन फिर भी वे 61 में साथ आ गए और दिल्ली विजय तक उनका साथ दिया व पानीपत तक पहुंचाया। उन्हें 1 महीने तक फ्री खाना दिया, उन्हें रणनीति बताई वह न मानी हम गयी। मानते तो वे उन्हें सारी सेना का वेतन तक देने को वो तैयार थे। उन्होंने युद्ध के बाद भी लाखों खर्च करके घायल मराठों व उनकी औरतों को शरण दी, उन्हें बचाया। यह कुछ भी नही दिखाया गया है।

चलो न दिखाते परन्तु अलग होने की सही वजह तो दर्शाते कि भाऊ उनसे चिढ़कर उन्हें बन्दी बनाने की योजना बना चुके थे। तब होलकर व सिंधिया ने उन्हें बता कर उन्हें वहां से जाने का आग्रह किया। मजबूरन उन्हें जाना पड़ा। उनके कद, चरित्र, रौब व पद का भी बिल्कुल भी ख्याल न रखा गया। इस जानबूझकर की गई द्वेषपूर्ण गलती के लिए फ़िल्म निर्माता का भरपूर विरोध सभी सनातनियों को करना चाहिये ताकि गलतियां सुधारने के बाद ही इस फिल्म का प्रदर्शन हो।

जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल जी की!

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