कविता

वह दिन निश्चय ही आएगा

दहले हुए दिल से,
क्या लिखें और कैसे लिखें!
लेखनी भी निःशब्द होकर सोच रही है,
क्या लिखें और कैसे लिखें!
सारी हदें पार कर दी हैं,
स्वार्थपरकता और दरिंदगी ने,
न्याय को भी सोचने को विवश कर दिया है
खुदगर्ज़ मानव की शर्मिंदगी ने.

जिंदगी की जंग लड़ रहे
बोरवेल में गिरे बच्चे को
बचाने के प्रयत्न चल ही रहे थे कि
महाराष्ट्र की कुर्सी की जंग शुरु हो गई,
हैदराबाद की बेटी से दरिंदगी और नृशंस हत्या,
दिल को एक और ज़ख्म दे गई.

अभी वह ज़ख्म ताज़ा ही था कि
उन्नाव के रेप पीड़िता को जलाने ने,
मन को एकबारगी जला दिया,
उसकी दर्दनाक मौत ने मौत को भी दहला दिया.

ज़ख्म अभी और बाकी थे,
दिल्ली में अग्निकांड ने अग्नि को भड़का दिया,
अंदर से ‘बारूद’ थी इमारत, निकलने को एक दरवाजा,
काल की देवी कहती रही ”तू भी आजा” ”तू भी आजा”,
एक-एक कर 43 लोग अग्नि की भेंट चढ़ गए,
अपने परिवारों को ही नहीं, पूरे देश को रोता छोड़ गए.

रेप में नाकाम पीडोफिलिया मनोरोग से बीमार युवक ने,
बिहार की युवती को जलाने की कोशिश कर,
पीड़िता को ही नहीं फिर से सबको दहला दिया,
मानवता शर्मसार हो रही है,
दानवता नित नया आकार ले रही है.

जाने कब यह दुर्दांत मंजर रुख्सत लेकर जाएगा!
पीड़ाओं का अंधियारा छंट पाएगा?
लो सूरज की किरणों ने आकर मन को सहला दिया,
”मत मायूस कर मन को यह तम भी हट जाएगा,
जल्दी ही मानव संभल जाएगा,
एक बार फिर जग जगमग हो जाएगा,
लेखनी में फिर से उत्साह का ध्वज लहराएगा,
मन में मौज का दरिया लहराएगा,
है कठिन, मगर होगा ज़रूर,
वह दिन निश्चय ही आएगा.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “वह दिन निश्चय ही आएगा

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