पर्यावरण

अथ श्री डिजिटल थीसिस की कथा

यह 15 अक्तूबर 2019 की बात है, मेरे छात्र डॉ.अजय सोनी, मेरे कक्ष में आये, उन्हें अपनी थीसिस को अन्तिम रूप देना था I मेडिकल कॉलेज में 33-34 साल अध्यापन से जुड़े होने के बाद पहली बार किसी स्नातकोत्तर विद्यार्थी का सह मार्गदर्शक बना था I उन्हीं से पता चला कि थीसिस की 9 प्रतियाँ बनाना पड़ेंगी I मेरा माथा ठनका और मैंने तय किया कि थीसिस को डिजिटल बनाये जाने की दिशा में कोशिश करना चाहिए I

मैंने अजय सोनी को कुछ पॉइंट्स बताए और कहा कि कुलपतिजी को मैं पत्र लिखूंगा, आप इन बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए एक पत्र बना दो, उन्होंने बनाया फिर मैंने उसका यथोचित अपनी भाषा शैली में परिमार्जन किया और डॉ.आशुतोष श्रीवास्तव और डॉ.वन्दना वर्मा मेडम के साथ चर्चा कर उस पत्र को थोड़ा समृद्ध कर माननीय कुलपतिजी को भेजा I

दरअसल हमारे आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपतिजी सदैव ही बड़े ही ग्रहणशील (रिसेप्टिव) मोड में रहते हैं और उन्हें कुछ जंच जाए तो निर्णय लेने की क्षमता से उन्हें भगवान् ने समृद्ध बना रखा है और त्वरित निर्णय लेकर क्रियान्वित करने में भी विलम्ब नहीं करते हैं I बस, इसी प्रत्याशा में उन्हें चिट्ठी लिख डाली I

अक्तूबर से दिसम्बर के बीच लगातार तीन चार आवेदन कर दिए और फोन पर भी बात कर ली I केन्द्रीय उच्च शिक्षा मंत्रालय, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय को भी इसी आशय के पत्र लिखें, चूँकि कुलपतिजी का यह माह कार्यकाल की दृष्टि से अन्तिम है, इसलिए चाहता था कि निर्णय हो जाए और प्रसन्नता का विषय है कि यशस्वी कुलपति डॉ.आर.एस. शर्मा साहब ने इस विषय में सकारात्मक निर्णय लेकर पत्रकारों को भी उन्होंने सूचना दे दी I

मेरे लिए अतिरिक्त प्रसन्नता का विषय यह है कि परमात्मा ने मुझे निमित्त बनने का सौभाग्य दिया I

वस्तुतः थीसिस को डिजिटल करने से होने वाले समस्त लाभों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है I

  1. पेपर बचेंगे, पेड़ बचेंगे, पर्यावरण संरक्षण होगा I
  2. विद्यार्थी का पैसा बचेगा, अभी डॉ.अजय सोनी के 15000/ खर्च हुए थे I
  3. अधिष्ठाता को अपने संस्थान के सौ-दो सौ यानी हरेक विद्यार्थी की 8-9 थीसिस पर हस्ताक्षर करना होते हैं, यह एक बहुत बड़ा दायित्व होता है I अधिष्ठाता जैसे बेहद व्यस्त और जिम्मेदार अधिकारी के अनेकों परिणाममूलक कार्य-घण्टों का निवेश इसमें अनिवार्य रूप से हो जाता है, वह बहुत ही कीमती समय अब बचेगा I
  4. विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और विभागीय वाचनालय में थीसिस रखने की जद्दोजहद से बचेंगे, जगह की आवश्यकता नियन्त्रित रहेगी I उनको सहेजने–सम्भालने का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व वाचनालय प्रभारी का होता है, कर्मचारियों की संख्या को देखते हुए यह दायित्व महान कष्टकारी हो जाता है, उससे बचाव होगा I
  5. थीसिस के रखरखाव और कीटनाशकों के अभाव में उनमें दीमक लगने की सम्भावना रहती है और वह केवल थीसिस पर एकाग्र नहीं रहती, बल्कि भवन को भी भंगुर बनाने में सक्षम होती है I उससे भी रक्षण होगा I
  6. प्रतिवर्ष हर मेडिकल कॉलेज में सौ से दो सौ विद्यार्थी अपनी थीसिस 7 से 9 प्रतियों में जमा करवाते हैं उनमें से कुछ प्रतियाँ जबलपुर भेजी जाती हैं, इसी वर्ष कॉलेज को कोरियर के लिए सात हजार खर्च करना पड़े थे, इस धन की भी प्रतिवर्ष बचत होगी I
  7. थीसिस का मूल्यांकन करने वाले बाह्य शिक्षक को भी एक-एक प्रति मिलती है, उसे भी सम्भालने का गर्व और मोह रहता है, उससे भी मुक्ति मिलेगी I

अस्तु,

पर्यावरण के प्रति मेरे झुकाव के पीछे अनेक व्यक्तियों की प्रत्यक्ष-परोक्ष भूमिका रही है I

  • 45-50 साल पहले की स्मृतियाँ बता रही हैं कि मेरे पिता श्री शान्तिलालजी भण्डारी हमारे ही मोहल्ले के श्री पार्श्वनाथ मन्दिर में नित्य पूजा करने जाते थे, वे मन्दिर परिसर के पेड़ के नीचे कपड़ा बिछवा कर गिरे हुए फूलों को ही परमात्मा को चढाते थे, उनको लगता था कि फूलों को तोड़ने से उन्हें पीड़ा होती है और ऐसा करना हिंसा है, तथा हिंसा का अपराध कर अहिंसा के प्रवर्तक परमात्मा की पूजा नहीं हो सकती है I मैं प्रतिदिन पूजा करता हूँ, परन्तु उन्हीं संस्कारों के कारण घर के पौधों में अनेक फूल होते हुए भी मैं भगवान को चढाने के लिए फूल नहीं तोड़ पाता हूँ, बिना फूलों के ही मेरी पूजा सालोंसाल से चल रही है I
  • 9 वीं कक्षा में बागवानी विषय के कालखण्ड में स्कूल परिसर में श्रीवास्तव साहब के मार्गदर्शन में स्वयं द्वारा उगाई गई भिण्डी कच्ची ही खाई भी है, इससे भी मेरे बालमन में पर्यावरण के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ होगा I
  • मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के बाद तत्कालीन अधिष्ठाता डॉ.एम.एम.अरोरा साहब ने पाम ट्रीज को रोपने का अभियान चलाया था, संयोगवश उस समय हमारी बैच के अनेक छात्र भी थे, मैं और रवीन्द्र वाधवानी तथा अन्य सहपाठी उपस्थित थे I
  • बाद में, संवाद नगर में प्रसिद्ध पर्यावरणविद पद्मश्री श्री टी. गोविन्दन कुट्टीमेनन साहब हमारे पड़ोसी बनें, संयोगवश उनका घर हमारी ही कॉलोनी में बन रहा था I उनकी प्रेरणा, सक्रिय सहयोग एवं मार्गदर्शन में और तत्कालीन अधिष्ठाता डॉ. एस.के. बंडी की अनुमति से मेडिकल परिसर में पौधरोपण का सतत अभियान शुरू किया, जो आज भी सतत चल रहा है I मेनन साहब की प्रेरणा से बची रहे ! पृथ्वी, जब रूठे गणेशजी और रे ! मनक मां के मां कदी समझेगा पुस्तिकाओं की रचना की और उनका भव्य विमोचन भी हुआ I श्री अनिल भण्डारी, गौभक्त स्व. श्री महेन्द्र जी बम का अनुपम सहयोग रहा I
  • मैं आभारी हूँ, माननीय श्री दीनानाथजी बत्रा और मान. श्री अतुलजी कोठारी का, जो मुझे पर्यावरण संरक्षण हेतु व्याख्यान का अवसर देते रहते हैं I

अस्तु, मैं डिजिटल थीसिस के मामले में मुझे निमित्त बनाए जाने के कारण परमात्मा की असीम अनुकम्पा के लिए उनके श्री चरणों में नमन करता हूँ I

मैं ह्रदय की गहराइयों से यशस्वी कुलपति डॉ.आर.एस.शर्मा साहब के सदैव ही रिसेप्टिव मोड में बने रहने वाले स्वभाव और सहज-सरल उदार स्वभाव की अतिशय प्रशंसा करते हुए उनका आभारी हूँ I

मैं विभागाध्यक्ष डॉ.रवीन्द्र वाधवानी का आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे सह मार्गदर्शक बनाया,

डॉ.आशुतोष श्रीवास्तव और डॉ.वन्दना वर्मा मेडम का भी उनके अहेतु के सहयोग के लिए आभारी हूँ I डॉ.अजय सोनी का भी आभारी हूँ I

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