सामाजिक

क्या है साइकोलॉजी : मानव आत्मविज्ञान यानी मनोविज्ञान के क्षेत्र में हम विश्व गुरु हैं

साइकोलॉजी ग्रीक शब्द है, जो साइके (आत्मा) और लोगस (विचार-विमर्श) से बना है, जिसका अर्थ है, आत्मा का ज्ञान. परन्तु अधिकाँश पाश्चात्य विद्वान मन पर ही ठहर गए हैं. जबकि भारतीय ग्रंथों में मन के पार जाने की विधाओं का वर्णन है. भले ही अमेरिका के मनोविज्ञानियों ने मनोविज्ञान की 29 शाखाओं का आविष्कार कर लिया हो, परन्तु हमारी साइकोलॉजी वास्तव में आत्मा का विज्ञान है.

हमारे शास्त्रों में दी गई, व्यक्ति और मनुष्य की परिभाषा से ही हमें ज्ञात हो सकेगा कि भारतीय आत्मविज्ञान बनाम मनोविज्ञान कितना प्राचीन है. श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से सम्पूर्ण चराचर भूतगण व्यक्त हुए.” गीता में लिखा है, अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः “अव्यक्त ब्रह्म ही पेड़, पौधों, देवी, देवताओं और मनुष्य आदि के रूप में यानी व्यक्ति के रूप में प्रकट हुए.” भगवान यह भी कहते हैं, ॐ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत. अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना..  हे अर्जुन ! सभी भूत मात्र जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जानेवाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट है; फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना ? व्यक्ति शब्द से ही ध्वनित होता है कि किसी अव्यक्त, अदृष्ट अनाकलनीय, अचिन्त्य तत्व का दृष्ट, चिन्तनीय और आकलनीय प्रकट स्वरूप ही व्यक्ति है. इसी का विस्तार करें तो अन्तःकरण में स्थित ऊर्जा का बहिः प्रस्फुटन ही व्यक्तित्व है. सरल शब्दों में कहें तो व्यक्ति की भाववाचक संज्ञा व्यक्तित्व है.

पंचकोशीय व्यक्तित्व की अवधारणा

तैतरीय और सर्वसार उपनिषद में व्यक्तित्व के सन्दर्भ में पंचकोष का वर्णन है, अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश. ये पाँचों कोश आत्मा के आवरण माने गए हैं. व्यक्तित्व के समग्र विकास के लिए इन सभी कोशों का सम्यक विकास अनिवार्य माना जाता है. विलियन जैम्स तथा मैस्लो जैसे कुछ पाश्चात्य मनोविज्ञानियों ने व्यक्तित्व के चार सोपान बताएं हैं. भौतिक व्यक्तित्व (मटेरियल सेल्फ), सामाजिक व्यक्तित्व (सोश्यल सेल्फ), आध्यात्मिक व्यक्तित्व (स्पिरिचुअल सेल्फ) और शुद्ध अहम् (प्योर ईगो). इसी क्रम में बात करें तो हमारे शास्त्रों में यत्र-तत्र-सर्वत्र चार पुरुषार्थ का शास्त्रीय क्रम है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. यह क्रम ही वास्तविक रूप से चरित्र का निर्माण है. सरल शब्दों में इसकी विवेचना करें तो, धर्म अर्थात् नैतिकता के साथ धन का अर्जन, उस धन से कामनाओं की पूर्ति (सुख-सुविधाओं की प्राप्ति) और परोपकार की भावना के साथ धन का सदुपयोग भी ताकि मोक्ष के मार्ग में प्रवत्त हो सकें. वर्तमान में धर्म और मोक्ष को कचरा पेटी में डाल दिया है और विद्वेषपूर्वक येन केन प्रकारेण, धन की प्राप्ति, फिर चाहे किसी का भी अहित करना पड़े और यहाँ तक कि अपने माता-पिता की भी हत्या क्यों ना करना पड़े, (यह चरित्र की अपेक्षा भविष्य निर्माण की हमारी प्रवृत्ति का सहज परिणाम है) और अहंकारपूर्वक उस धन से, अन्यों को नीचा दिखाने हेतु अच्छी और बुरी सुविधाओं को प्राप्त करना.

मनुष्य शब्द की उत्पत्ति

सभी अन्य जीवधारियों में प्राण ज्यादा सक्रिय हैं, इसीलिए उन्हें प्राणी भी कहा जाता है. तैतरीय उपनिषद में उल्लेख है कि जिन जीवात्माओं में मन अर्थात् मनोमयकोश अन्नमय और प्राणमयकोश से अधिक सक्रिय हो, वह मनुष्य या मानव कहलाता है. और जब हम मनोमय कोश से ऊपर उठते हैं तो विज्ञानमय कोश तक पहुंचते हैं, और विज्ञानमय कोश के पार है, आनन्दमय कोश. यानी आत्मा से साक्षात्कार का मार्ग. सबके भीतर परमात्मा की उपस्थिति को स्वीकारने का प्रबल भाव ही आनन्दमय कोश है.

भारत के कण कण में आत्मविज्ञान अर्थात् मनोविज्ञान के सूत्र हैं

मैं अपने जीवन में पीछे लौटकर देखता हूँ तो मुझे कहावतों, नीति सूत्रों, कहानियों, बड़ों के कथनों और सीख आदि सभी में मानव मनोविज्ञान के स्पष्ट दर्शन होने लगे हैं. मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मनोविज्ञान के क्षेत्र में दुनिया में हम जैसा कोई है ही नहीं और हो भी नहीं सकता है. हमारे सारे वेद –उपनिषद, धार्मिक ग्रन्थ एवं अन्य शास्त्र, विदुर और चाणक्य नीति, महात्मा गौतम बुद्ध की जातक कथाएं और उनके द्वारा प्रतिपादित शास्त्र, जैन तीर्थंकर आदिनाथ से लेकर महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित आचारांग और उत्तराध्ययन सूत्र,  महर्षि पतंजलि का योगशास्त्र  और विभिन्न सूत्र, आचार्य चरक द्वारा रचित संहिता, अष्टावक्र गीता, आदि शंकराचार्य द्वारा रचे गए शास्त्र, भर्तृहरि नीति, वैराग्य और श्रृंगार शतक, पंचतन्त्र की कहानियां, कबीर की साखियाँ और भक्त कवि रहीम के दोहें, दादी-नानी की कहानियाँ, हमारे यहाँ प्रचलित लोक कथाएं, मुहावरे-कहावतें, तीज-त्यौहार, परम्पराएँ, रीती-रिवाज, स्वामी विवेकानन्दजी का साहित्य, महर्षि रमण के वचन आदि आदि सभी में मानव मनोविज्ञान के विभिन्न आयामों के अतिरिक्त मन के पार ले जाने के सूत्र सहजता से समाहित हैं, अवगुंठित हैं. पन्ना धाय की कथा भी मानवीय मन की उच्चता का प्रतिनिधित्व करती है. अत्यन्त दुःख और खेद की बात है कि पाश्चात्य देशों को श्रेष्ठ समझने की मानिसकता और आत्मविस्मरण के कारण हम जीवन के हरेक क्षेत्र में स्वयं को दीनहीन मानते रहे हैं. ये कहावतें हम पर बिल्कुल सत्य सिद्ध होती हैं- “घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध” या “घर की मुर्गी दाल बराबर” अथवा “कांख में छोरा, गाँव में ढिंढोरा.”

शिक्षक के रूप में हमारा दायित्व वृहत्तर और अति महत्वपूर्ण है

शिक्षक के रूप में परमात्मा ने हमें बहुत ही वृहत्तर और अति महत्वपूर्ण दायित्व दिया है. विद्यार्थियों में अनन्त सम्भावनाएं हैं, उन्हीं विद्यार्थियों में सर्वपल्ली राधाकृष्णन, स्वामी विवेकानन्द, सरदार वल्लभभाई पटेल, जगदीशचन्द्र बसु, ध्यानचन्द, उड़नपरी उषा, मिल्खासिंह, प्रकाश पादुकोण, आइन्स्टाइन, आदि समाहित हैं, हमें बस, उन्हें उकेरना हैI स्वामीजी कहा करते थे कि शिक्षा का उद्देश्य है, उनके भीतर की प्रतिभा का प्रस्फुटन, प्रकटीकरण.

हमें अपने कथनों, अपने आचरण, अपने आचार-विचार, व्यवहार, चरित्र, रहन-सहन आदि से अपने विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क में आदर्श जीवन मूल्यों का बीजारोपण करना चाहिए, वे इस महान देश के भावी कर्णधार हैं, जिसे विश्व गुरु माना जाता रहा है. यदि हम प्रामाणिकता से अपना दायित्व निभाते हैं तो हमें सुयश से कोई भी वंचित नहीं कर सकता है, हमें सुखी और सन्तुष्ट तथा तुलनात्मक रूप से स्वस्थ बने रहने से कोई नहीं रोक सकता है. जहां तक आर्थिक समृद्धि का प्रश्न है, यह तुलनात्मक होती है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर निर्भर करती है. भक्त कवि रहीम के शब्दों में कहें तो“गोधन, गजधन बाजिधन और रतन धन खान. जब आवे संतोष धन, सब धन धुरि समान.”

धन प्रधान नहीं चरित्र प्रधान जीवन हो

हमें शिक्षक होने के नाते अपने विद्यार्थियों को मनोविज्ञान के आधारभुत सिद्धांतों के अन्तर्गत समझाना होगा कि धन की अपेक्षा नैतिकता जीवन में अधिक महत्व रखती है. हमारा जीवन चरित्र प्रधान होना चाहिए, दूसरों का अहित कर पैसा कमाना अन्तत: अपने लिए ही दुखों को आमंत्रित करने जैसा है. चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अपने समयसाध्य शोधों से सिद्ध कर दिया है कि मित्रता, सामाजिकता, समाज सेवा आदि जीवन में सुख, सन्तुष्टी, सुरक्षा का भाव और सफलता लाती हैं, साथ ही मनोशारीरिक रूप से व्यक्ति को स्वस्थ रखती है. ऐसे ही शोधों के आधार पर उन्हें सिखाना होगा कि कर्तव्य को बोझ नहीं आनन्द मानने से सुख तथा सन्तुष्टी तो मिलती ही है साथ ही अनायास ही तनाव की बजाय आश्वस्ति का भाव मन-मस्तिष्क में हिलोरे लेने लगता है. इससे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर जैसी बीमारियाँ नहीं होती हैं.

आधुनिक बच्चों में सहनशीलता का बीजारोपण करना होगा

आजकल परिवार छोटे हो गए हैं और अभिभावक बहुत ज्यादा व्यस्त हैं. छोटा परिवार होने से बच्चों को मिलने वाला लाड़ प्यार बंटता नहीं है. दादी-नानी कहानियों के माध्यम से बच्चों में दैनन्दिन संघर्षों के प्रति जिस मानसिक टीकाकरण का अनायास ही रोपण हो जाया करता था, वह अब दुर्लभ हो गया है. बच्चें कहानी के नायक की संघर्ष गाथा के हिसाब से जीवन में आई विपदाओं को साधने या टेकल करने की विधा से परिचित रहने के कारण निराश होने की बजाय जूझना सीख जाते थे. उसके दिलोदिमाग में परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाया करती थी.

अधिकाँश बच्चें पारिवारिक डांट-फटकार से अनभिज्ञ रहते हैं. अभिभावक अपने बच्चों की हरेक इच्छा पूरी करने में देर नहीं करते हैं, ऐसे बच्चों को हम पेम्पर्ड चाइल्ड भी कह सकते हैं, लाड़ प्यार के चलते वे असहनशीलता के शिकार हो जाते हैं. उनकी हर छोटी-बड़ी, उचित-अनुचित मांग पूरी करने में अधिकाँश अभिभावक विश्वास करते हैं. उनके पास अपने बच्चों को जीवन के संघर्ष और दैनन्दिन जीवन के सूत्रों को समझाने का समय भी नहीं होता है. खेलते समय भी माता-पिता बच्चों को जिताते हैं, इसकारण बच्चें बचपन में हार से साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं, लिहाजा पराजय, असफलता क्या होती है, जान नहीं पाते हैं. इसके चलते उनमें हार को सहने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती है. फलस्वरूप विद्यार्थी जीवन में आने वाली छोटी-सी असफलता उन्हें निराशा और अवसाद के अभेद्य चक्रव्यूह में फंसाने में सक्षम हो जाती है. वर्तमान में समाचार पत्रों में छोटे-छोटे बच्चों द्वारा परीक्षाओं में असफल होने पर आत्महत्या जैसे अवांछित और अनपेक्षित निर्णय का बड़ा कारण भी यह है. कुछ बच्चें ज्यादा ही नकचढ़े और सिरचढ़े हो जाते हैं, और शिक्षक द्वारा जरा-सा डांटने पर अप्रिय स्थितियां आकार ले लेती हैं. ऐसी स्थिति में शिक्षकों को हरेक बच्चे का मनोविज्ञान पढ़ना आना अनिवार्य-सा हो गया है. भले ही ऐसे अवांछित किस्म के बच्चें हमारे विद्यार्थी हों, हमें प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उन्हें जीवन संघर्ष और हार जीत के बारे में समझाना होगा.

कृतज्ञता और आभार प्रदर्शन के विज्ञान को समझना होगा

हमारे सभी शास्त्रों का शुभारम्भ आभार से होता है, नदियों, पहाड़ों, सूर्य, चन्द्रमा, पवन आदि के प्रति भी नतमस्तक होना हम सीखते हैं और हमें यही सिखाया जाता है कि माता-पिता, गुरु और उपकारी लोगों के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए. इसके महत्व को प्रतिपादित करते हुए डॉ.राबर्ट इमेंस ने द साइकोलॉजी ऑफ ग्रेटिट्यूड नामक पुस्तक में आभार के मनोशारीरिक लाभों का विस्तार से वर्णन किया है और कृतघ्नता से होने वाली हानियों का भी वर्णन किया है. श्रीरामचरितमानस में एक चौपाई है, प्रातकाल उठि कै रघुनाथा. मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥ माता-पिता, गुरु को मस्तक नवाने का अर्थ आभार का प्रकटीकरण तो है ही साथ ही उनके आशीर्वादों को प्राप्त करना भी है. आशीर्वादों के सकारात्मक स्पन्दनों के विषय में प्राणऊर्जा के विज्ञानियों ने बहुत अध्ययन किया है. आजकल धन्यवादहीनता का प्रभुत्व हो चुका है और इसके कारण अवचेतन मन में ग्रंथियां पड़ जाती हैं, जो अन्तत: किसी न किसी रोग अथवा साइकोलाजिकल समस्या के रूप में प्रकट होती है. हमें अपने विद्यार्थियों को धन्यवाद देना और उसके महत्व को बताना होगा.

षट विकारों के प्रति जागरूकता लाना होगी

मनोविज्ञान के सूत्रों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों के शोधों के आधार पर हमें बताना होगा कि मद, अहंकार, क्रोध, लोभ, लालच, घमण्ड, ईर्ष्या, निन्दा, परपीड़ा अन्तत: दुःख, तनाव, तनावजनित रोगों के लिए उत्तरदायी होता हैI

परहित और सहजीवन के संस्कार देने का कष्ट करें

उन्हें बताना होगा कि परहित की भावना से तन, मन और मस्तिष्क स्वस्थ रहता है. अकारण ही किसी की सहायता करना सिखाएं. पक्षियों के लिए दाना-पानी देने की आदत डालें. इससे उनमें पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व का बोध, एक स्थायी संस्कार के रूप में प्रवेश कर सकता है और परोपकार का भाव भी स्वभाव का हिस्सा बनने लगता है. पौधारोपण और उनके द्वारा लगाए गए पौधों का पालन-पोषण प्रकृति के घटकों के बीच एक दूसरे पर आश्रित सहजीवन को संस्कारित कर सकता है. हरियाली अमावस्या, आंवला नवमी, बसन्त पंचमी, मकर सक्रान्ति (तिल गुड़), तुलसी विवाह, पीपल पूजा आदि त्यौहारों की महत्ता पर केन्द्रित आधे घंटे का कार्यक्रम पाठशालाओं में किया जा सकता है.

प्रतिदिन आधा घंटा स्वाध्याय से सुलझेंगी मानव मन की गुत्थियां

मेरा आग्रह है किशिक्षक होने के नाते आप केवल आधा घंटा धार्मिक ग्रन्थों को नियमित रूप से पढ़ें और उनमें सन्निहित मनोविज्ञान के सूत्रों को खोजने का सफल प्रयास करें. हरेक शिक्षक-विद्यार्थी  यदि श्रीमद्भागवतगीता, श्रीरामचरितमानस, महाभारत, चाणक्यनीति, आदि ग्रंथों  के एक-एक या दो-दो अध्यायों अथवा 10-10 श्लोकों-चौपाइयों पर केन्द्रित चिन्तन-मनन और मीमांसा करते हुए शोध पेपर तैयार करेंगे तो पूरे देश में आपका और आपके महाविद्यालय अथवा स्कूल का नाम होगा. दो-दो शिक्षक मिलकर करें, यह बहुत ही अनूठा काम होगा और यदि एक शोध पुस्तिका साल में दो बार आपका महाविद्यालय ही प्रकाशित करना शुरू कर दें तो बहुत ही अनुकरणीय तथा प्रशंसनीय कार्य होगा.

चौपाइयां नहीं, गागर में सागर हैं

श्रीरामचरितमानस में लिखा है कि मोह ने किसे अन्धा नहीं किया, काम ने किसे नहीं नचाया, तृष्णा ने किसको मतवाला नहीं बनाया, क्रोध ने किसका ह्रदय नहीं जलाया, लोभ ने किसकी मट्टी पलीद नहीं की, धन के मद ने किसको टेढा नहीं किया, प्रभुता (सत्ता) ने किसको बहरा नहीं कर दिया, ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी के नेत्रबाण न लगे हों, मान और मद ने किन्हें अछूता छोड़ा है. इसी तरह उत्तरकाण्ड के 121 वें दोहे की 18 चौपाइयों में सात प्रश्नों के जो उत्तर हैं, उनमें मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान के अनेक सूत्र समाहित हैं. सुग्रीव से बातचीत करते हुए भगवान् श्रीराम ने मित्र-मनोविज्ञान के सूत्र उजागर किये हैं. इन चंद चौपाइयों में मनोविज्ञान के अनेक अध्यायों के सूत्र समाहित हैं.

श्रीरामचरितमानस की एक चौपाई में कलियुग के कुछ शिक्षकों के विषय में लिखा है कि “हरइ सिष्य धन सोक न हरई. सो गुर घोर नरक महुं परई..”, इस चौपाई के प्रकाश में हमें विद्यार्थियों के प्रति अपने महान कर्तव्य का प्रामाणिकता और निष्ठा से निर्वहन करना होगा.

वर्तमान समय के माता-पिता की मानसिकता का भी चित्रण किया है, “मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं. उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं.I”, यही कारण है कि ट्यूशन का व्यवसाय विद्रूप रूप ले चुका है और माता-पिता पैकेज प्रधान शिक्षा के अनुयायी हो गए हैं, जिसका अन्तिम परिणाम यह हो रहा है कि लाड़ले बेटे-बेटियां धन के लिए माता-पिता को घर से निकालने अथवा उनकी हत्या तक करने लगे हैं, और ऐसी घटनाएं बढ़ने लगी हैं.

अन्तर्निहित प्रतिभा का प्रस्फुटन शिक्षक और शिक्षा का परम उद्देश्य है

स्मरण रहे, सभी उम्र के विद्यार्थियों को पढ़ाते समय हमें इस वैज्ञानिक तथ्य को याद रखना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य और शिक्षक का परम कर्तव्य है कि विद्यार्थियों में अन्तर्निहित प्रतिभा का प्रस्फुटन करना. अतएव हम उन्हें यह कभी न कहें कि तू तो गधा है, तुम मूर्ख हो, तुम कुछ नहीं कर सकते हो. तुम्हारे भेजे में गोबर या भूसा भरा है. किसी दूसरे विद्यार्थी से तुलना न करें. आधुनिक मनोविज्ञानियों ने संगत के विषय में अनेक बातें कहीं हैं, परन्तु सत्संग के लाभों को तुलसीदासजी ने एक चौपाई में ही बता दिया है, एक घड़ी, आधी घड़ी आधी में पुनि आध तुलसी सांगत साधु की कटे कोटि अपराध. अच्छी संगत के लाभों के प्रकाश में हम कुसंगति की हानियों का अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है.

विद्यार्थियों के मन में स्वयं के प्रति श्रद्धा और विश्वास का संचार करें

श्रीरामचरितमानस के प्रारम्भिक श्लोक में विद्यार्थी अथवा अध्येता के विषय में जो लिखा हैं वह अनूठा है, मनोविज्ञान का बहुत बड़ा सूत्र है- भवानी-शंकरौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ. याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्.. अर्थात् श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप पार्वतीजी और शंकरजी की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्त:करण में विद्यमान ईश्वर को देख नहीं सकते. इसका सीधा-सा अर्थ है कि बिना श्रद्धा और विश्वास के कोई भी ज्ञान व्यक्ति के अन्त:करण द्वारा ग्राह्य नहीं हो सकता है, इसका परोक्ष अर्थ यह भी है कि शिक्षक होने के नाते हमारा व्यक्तित्व ऐसा हो कि हमारा चरित्र विद्यार्थी के मन-मस्तिष्क में शिक्षक के प्रति श्रद्धा और विश्वास का संचार करें.

विद्यार्थी की तुलना किसी अन्य विद्यार्थी से करना ईश्वर का अपमान है

विद्यार्थी के मन-मस्तिष्क में यह भावना कूट कूट कर भरना हमारा दायित्व है कि हरेक व्यक्ति अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है. उसे ईश्वर ने सबसे अलग बनाया है, उसका जीवन निरर्थक नहीं है, इसमें तुलना का कोई प्रश्न है ही नहीं. हम भी किसी एक विद्यार्थी की तुलना दूसरे किसी विद्यार्थी की किसी विशेष क्षेत्र की श्रेष्ठता से कदापि ना करें. उन्हें ईश्वरचंद्र विद्यासागरजी की कथा सुनाएं, जिनके हाथों की लकीरों के आधार पर बचपन में एक ज्योतिषी ने कह दिया था कि तुम्हारे हाथ में विद्या की रेखा ही नहीं है और उन्होंने घर दूर जाकर चाक़ू से विद्या की रेखा अपने हाथ से खींच डाली. सर डॉ.जगदीशचन्द्र बोस, भारतरत्न डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम, सर आइजेक न्यूटन, आइन्स्टाइन जैसे लोगों की जीवनी पढ़ाएं. दिव्यान्गों के अनूठे किस्से और सफलता की कहानियाँ लगभग हर सप्ताह अखबारों के माध्यम से दुनिया की नज़रों आती हैं, उनसे बच्चों को प्रेरणा मिल सकती है. ऐसी कहानियाँ आत्महीनता से ग्रस्त अथवा शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर विद्यार्थियों को ही प्रस्तुत करने के लिए कहिए. मेडिकल कॉलेज, इन्दौर की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ.सुखवन्त बोस ने लगभग सात-आठ साल तक विशेष कोचिंग और प्रेरणा के माध्यम से कमजोर शैक्षणिक स्थिति के विद्यार्थियों का सफलतापूर्वक उन्नयन किया था और उनके उस पराक्रम में मेरी भी छोटी-सी भूमिका रही थी.

सबके ह्रदय में ईश्वर विराजमान हैं

श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवतगीता में अनेक चौपाइयों और श्लोकों में स्वयं भगवान कहते हैं कि मैं सभी के हृदयों में विराजमान हूँ, इस महामन्त्र को अपने विद्यार्थियों में दृढ़तापूर्वक स्थापित करने का प्रयास करेंगे तो नीति शास्त्रों की बातें स्वत: ही चरितार्थ होने लगेंगी. अपने विद्यार्थियों में आस्तिकता का भाव उत्पन्न कीजिए. उन्हें यह सिखाइए कि परिश्रम और प्रयास पर हमारा अधिकार है, फल जो भी मिले उसे स्वीकार करें, न तो प्रसन्नता के अतिरेक में अहंकारी बनें और न ही असफलता से निराश हों. असफलता की स्थिति में यह गहनता से मन में लाएं कि मेरे भगवान को यही स्वीकार था. आस्तिकता का सहज परिणाम हम कृषकों में देखते हैं कि वे अपनी फसल नष्ट हो जाने पर वे यह कहकर निराशा को धकेल देते हैं कि भगवान की यही इच्छा थी. यदि बच्चों में भगवान के प्रति आस्था दृढ हो जाएगी, तो असफलता उन्हें निराशा और अवसाद के चक्रव्यूह में नहीं फंसा सकेगी.

आदरणीय शिक्षको ! नीचे सन 1861 से 1865 तक अमेरीकी राष्ट्रपति रहे, श्री इब्राहिम लिंकन द्वारा अपने बेटे के शिक्षक को लिखे पत्र का हिन्दी अनुवाद को जस का तस चस्पा कर रहा हूँ, बहुत ही सारगर्भित पत्र है, प्रेरक है, दिशा बोधक भी है. हालाँकि ऐसा पत्र हरेक माता-पिता को उनके बच्चों के शिक्षक को लिखना चाहिए, परन्तु भारतीय माता-पिता इतने जागरूक और भविष्यदृष्टा नहीं हैं, एक जिम्मेदार शिक्षक होने के नाते हमें उस पत्र को अपने मन-मस्तिष्क में सदैव रखकर अपने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास के विषय में सोचना चाहिए.

अमेरीकी राष्ट्रपति श्री इब्राहिम लिंकन द्वारा अपने बेटे के शिक्षक को लिखा पत्र

मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं. यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी. पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है. हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है. मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है. ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ. पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है.

आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ. साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है. मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्‍छी बात नहीं है. यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए.

आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा. मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं.

मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्‍छा है. किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए. दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए. दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा.

आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है. और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे. मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी. तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा.

— डॉ. मनोहर भण्डारी 

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