हास्य व्यंग्य

प्याज का ठसका

गॉव में सप्ताह मे लगने वाले हाट बाजार का रास्ता सब देखते।उस दिन सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्री सस्ती औऱ अच्छी मिलती।सुबह भाव ज्यादा फिर कम होते जाते।गाँव मे किसान लोग सब्जी,अनाज, फल आदि बेचने आते बेचकर घर पर उपयोगी सामान लेकर जाते।प्याज की दुकान लगती जिसमे हरा पूछ वाला प्याज भी होता।इसकी सब्जी स्वादिष्ट लगती।नया प्याज औऱ पुराना प्याज के भाव भी अलग अलग। पढ़े लिखे व्यापारी पेपर पढ़ते।उसमे बाजार भाव भी आते उसको पढ़कर भाव लगाते।अभी एक खबर सुर्खियों में आई।बेंगलोर में प्याज का भाव दो सौ रुपये किलों तक जा पहुंचा।पहले गर्मी में यदि नकोली नकसीर होती तो उपचार स्वरूप प्याज फोड़ के सुंघाया जाता।लू लगने के डर से लोग जेब मे प्याज भी रखते थे।अब क्या रखे लगभग बीस रुपये का एक प्याज पड़ रहा है।ग्रेवी में डाले जाने प्याज न डाले जाने से स्वाद बेस्वाद हुआ जारहा।पोहे में ऊपर से प्याज की जगह मूली को उपयोग में लिया जा रहा।किन्तु प्याज की बात ही कुछ और है।मुक्के से फोड़ कर प्याज खाने वाले परेशान उन्हें चाकू से कतरे हुए प्याज की एक रिप वो भी मांगने पर मिलती है।शाम को मयखाने में प्याज चखने में नही मिलने पर पियक्कड़ उदास।सब्जी भाजी में प्याज की पकड़ मजबूत है।प्याज के बिना सब्जियों के स्वाद की लोग बाग झूठी तारीफ करने लगे।प्याज के भाव का रुतबा औऱ रिकार्ड सेवफल को पीछे छोड़ दिया।पहले प्याज खाते तो लोग बाग माउथ फ्रेशनर का उपयोग करते ताकि प्याज की बदबू नही आए।किन्तु वर्तमान में प्याज कहा लिया वो सबसे ज्यादा धनवान। प्याज के छिलके उतारने की कहावत अब महंगी होगई। बाजार जाते और प्याज लाते तो अब बच्चें आसपास इकट्ठे होकर बड़े खुश होते और जोर से मम्मी को आवाज लगाते।मम्मी देखों पापा प्याज लाए।घर मे उत्सव का माहौल बन जाने लगा।दो प्याजा सब्जी होटलों में भाव बढ़ने का प्रमुख कारण प्याज रहा।प्याज की घरों में इज्जत औऱ ओहदा बढ़ गया।कभी प्याज – आँगन ,छत पर धूप खाने इधर उधर बिखरे पड़े रहते थे।
गिफ्ट में यदि प्याज मिल जाए तो दिन भर खुश और चेहरा मुस्कुता रहता।कुछ लोग प्याज नही खाते।पहले यदि भूल से प्याज नही लाते तो पड़ोसी से मांग लेते थे।अब मांगने में झिझक होने लगी।जिस प्रकार बाढ़ के पानी का स्तर बढ़ता उसी प्रकार प्याज ला भाव भी बढ़ता जा रहा।प्याज कतरने पर आँसू आते थे।अब भाव सुनकर सब रोने लगे।कही ऐसा ना हो फ़िल्म निर्माताओ को पटकथा ना मिले तो ये प्याज की पटकथा तैयार कर प्याज पर फिल्मांकन कर प्रदर्शित कर सकते है।लोग बाग पराठे रोटियां सिनेमा हॉल में ले जाकर फ़िल्म में प्याज के सीन देख कर रोटियां खा कर संतुष्ट हो सकते है।दुसरो को स्टोरी सुनाने के साथसिनेमा हाल में उज्जैनी ,बाग रोटी का आनंद भी बता सकते है।घरों में बिन पूछे यदि प्याज उठा लिया तो ग्रह युद्ध छिड़ जाता भले ही आप कमाकर लाते हो ।हुकूमत तो पत्नी की ही चलती है। क्या वाकई जिंदगी प्याज बिना अधूरी है?शायद स्वाद के रसिको के स्वर एक साथ उठेंगे -हाँ भई हाँ।
गिफ्ट लेने गया तो दुकानदार बोला कि भाई एक सलाह दू।।मैंने कहाँ दो भई ।फ्री की सलाह मिल रही तो क्यों न ले।उसने कहाँ गिफ्ट में मजा नही आएगा।मेरा तो सामान बिकेगा।मगर तुम्हे मजा नही आएगा।मेरी मानों तो कम से कम एक किलो प्याज ले आओं तुम पहचान के हो में उसे सही तरीके से पैक कर दूंगा।सामने वाले को जा दोगे तो जब खोल कर देखेगा तो तुम्हें मोबाइल पर दस बार थेँकु बोलेगा।प्याज तो बाजार का राजा बन चुका।सब्जियों के बीच उसकी ठसक देखते ही बनती।घर का नाम कांदा स्कूल का नाम प्याज भाव बढ़ने पर ओनियन इज्जत से पुकारा जाने लगा।वाह रे प्याज कर रहा तू राज।

संजय वर्मा ‘दृष्टि’

परिचय - संजय वर्मा 'दृष्टि'

पूरा नाम:- संजय वर्मा "दॄष्टि " 2-पिता का नाम:- श्री शांतीलालजी वर्मा 3-वर्तमान/स्थायी पता "-125 शहीद भगत सिंग मार्ग मनावर जिला -धार ( म प्र ) 454446 4-फोन नं/वाटस एप नं/ई मेल:- 07294 233656 /9893070756 /antriksh.sanjay@gmail.com 5-शिक्षा/जन्म तिथि- आय टी आय / 2-5-1962 (उज्जैन ) 6-व्यवसाय:- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग ) 7-प्रकाशन विवरण .प्रकाशन - देश -विदेश की विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ व् समाचार पत्रों में निरंतर रचनाओं और पत्र का प्रकाशन ,प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक " खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा -अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के 65 रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता भारत की और से सम्मान-2015 /अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित -संस्थाओं से सम्बद्धता ):-शब्दप्रवाह उज्जैन ,यशधारा - धार, लघूकथा संस्था जबलपुर में उप संपादक -काव्य मंच/आकाशवाणी/ पर काव्य पाठ :-शगुन काव्य मंच

Leave a Reply