लघुकथा

विवश

”बंजर भूमि में अब खिलेंगे फूल”. बंजर भूमि में संवेदनाएं शेष थीं, इसलिए वह फूलों की तरह हर्षित थी.

”बंजर भूमि पर उगने वाले कैक्टस में हैं कई प्रकार के औषधीय गुण”. बंजर भूमि अपने कैक्टस के औषधीय गुणों पर गर्वित थी.

”बंजर होता भारत: 30 प्रतिशत जमीन पर नहीं उग रहा अनाज का एक भी दाना.” बंजर भूमि अन्न-धन से मालामाल करने की चाह रखते हुए भी अपनी अशक्तता के कारण चिंतित थी.

पत्थरबाजी, आगजनी, सरकारी संपत्ति हो हानि पहुंचाकर किसी-न-किसी बहाने वैर-विरोध, वंचना-व्यंजना को प्रोत्साहन देने वाले बंजर समाज के विकृत चेहरे पर चिंता का तनिक भी आभास नहीं था.

”ठहरो” ठूंठ पर उगते हुए सूरज जैसी लालिमा लिए कोमल-किसलय समान कोंपल ने इसी मोड़ पर कथा को समाप्त करने वाले कथाकार की लेखनी को ललकारा- ”आशा अभी धूमिल नहीं हुई है.” बंजर समाज सोचने को विवश हो गया था.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “विवश

  • लीला तिवानी

    बंजर समाज के मन में कभी तो दया-प्रेम का संचार होगा! इसी उम्मीद पर दुनिया टिकी हुई है.

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