कविता

नहीं चलना

अंधेरे में
सनसनाते सन्नाटे में
मुझे नहीं चलना
दौड़ना
मैं व्याकुल, परेशान
ड़रता हूँ
खनखती पत्तियों से
झींगुरों की झीं झीं से
हवा की चाल से
शायद अपने आप से भी।
मैं उजड़े में समाहित
रहता हूँ
चलता हूँ
घूमता हूँ
अंधेरे से कोसों दूर
ताकि निड़र रह सकूँ
सुबह शाम
आज कल
हर समय
हर जगह।

परिचय - अशोक बाबू माहौर

जन्म -10 /01 /1985 साहित्य लेखन -हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संलग्न प्रकाशित साहित्य-विभिन्न पत्रिकाओं जैसे -स्वर्गविभा ,अनहदकृति ,सहित्यकुंज ,हिंदीकुंज ,साहित्य शिल्पी ,पुरवाई ,रचनाकार ,पूर्वाभास,वेबदुनिया आदि पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित I साहित्य सम्मान -इ पत्रिका अनहदकृति की ओर से विशेष मान्यता सम्मान २०१४-१५ से अलंकृति I अभिरुचि -साहित्य लेखन ,किताबें पढ़ना संपर्क-ग्राम-कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ईमेल- ashokbabu.mahour@gmail.com 9584414669 ,8802706980

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