लघुकथा

शैंडलेयर

समाचार पत्र में सुर्खी- ‘भारत और वेस्ट इंडीज दोनों टीम्स के कप्तान ‘गोल्डन डक’ का शिकार,” देखकर बादल का अतीत मुखर हो उठा था.

”एक समय मैं भी खुद को ‘गोल्डन डक’ समझने लग गया था. तब हर्षा ने ही मुझे प्रोत्साहन का संबल थमाया था. आज मैं सफलता के उस सोपान पर पहुंच गया था, जिस पर बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं. इतने बड़े ओहदे के पीछे का श्रेय हर्षा के प्रोत्साहन को ही जाता है.” बादल सोच रहा था.

”उस दिन भी मैं एक मैसेज पढ़कर मायूस हो गया था और सामने पड़े कागज पर यों ही काली कलम चलाने लगा था.”

”मायूस-से क्यों बैठे हो?” हर्षा ने चाय का कप उसके सामने रखते हुए पूछा था.

”ये देखो मैं ‘गोल्डन डक’ हो गया!” मोबाइल पर एक मैसेज दिखाते हुए बादल ने कहा.

”पहले ही साक्षात्कार में नाकाम होने पर इतनी मायूसी!” हर्षा ने फिर कहा था.

”जानते हो एक सफलता के पीछे कितनी असफलताओं का अनुभव छिपा होता है!”

”अरे वाह! बड़ा सुंदर शैंडलेयर बनाया है तुमने!” बात को सुखद मोड़ देने के लिए हर्षा ने उसके स्केच को देखते हुए हर्षित होकर कहा था.

”ये शैंडलेयर दिख रहा है तुम्हें! ये लट्टू है, लट्टू यानी मैं. समय जैसे-जिधर घुमा रहा है, घूम रहा हूं.” बादल की मायूसी तनिक और बढ़ गई थी.

”लट्टू और तुम! ध्यान से देखो यह शैंडलेयर लग रहा है. इतना सुंदर स्केच तुम्हें कहां-से-कहां पहुंचा सकता है. इसे शीर्षक दे दो- ‘लट्टू बनाम शैंडलेयर’ और इस सप्ताह की चित्र प्रतियोगिता में भेज दो.”

”रंगीन फसानों वाली आज की दुनिया में यह ब्लैक एंड व्हाइट चित्र कहां टिकेगा?”

”तुम शायद भूल गए हो, कि रंगीन फसानों वाली आज की दुनिया में हमने फिल्म ‘गोलमाल: फन अनलिमिटेड’ का ब्लैक एंड व्हाइट गाना ‘क्यों आगे पीछे डोलते हो भंवरों की तरह’ पचास बार देखा है और अभी तक हमारा मन नहीं भरा है.” हर्षा ने मुझे भंवरे की तरह आगे पीछे डोलने को विवश कर दिया था.

”आखिर सचमुच मैंने यही किया था और मेरा चित्र न केवल जीता था, बल्कि मुझे उस साइट का एडमिन भी बना दिया गया था. मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया था और दूसरी बार साक्षात्कार में मैंने टॉप किया था. तब से कला की दुनिया में भी मेरा नाम शीर्ष पर है और काम की दुनिया में भी.” उसे याद आ रहा था.

ड्राइंग रूम में लगे शैंडलेयर को देखते हुए बादल लट्टू नहीं शैंडलेयर बने रहने के लिए और अधिक प्रयास में जुट गया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “शैंडलेयर

  1. प्रोत्साहन में बहुत शक्ति है ये हमारे भीतर छुपी हुई उन शक्तियों को भी जागृत कर देता है जिनको हम खुद नहीं जानते. इसका जो सबसे बड़ा लाभ है वो ये कि कोई है जो हमारे ऊपर हमारे खुद से ज्यादा विश्वास करता है और हमको प्रोत्साहित कर रहा है और देखिए हर्षा का बादल पर विश्वास और उसका प्रोत्साहन बादल को कहाँ तक ले आया! अब बादल लट्टू से एक शैंडलेयर बन चुका था. यह सब प्रोत्साहन की जादुई शक्ति का कमाल था.

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