लघुकथा

पश्चाताप चक्र

सुबह-सुबह भुविका का फोन आया. उसका सुबकना उसके दर्द की दास्तां कह रहा था. पिता ने सुना तो सन्न रह गए! दामाद जी की इतनी हिम्मत! कि जरा-सी बात पर बेटी को थप्पड़ रसीद कर दिया! कितनी शारीरिक-मानसिक पीड़ा हुई होगी मेरी बेटी भुविका को! उसका दोष भी क्या था! बस सेमीनार पर जाते हुए उसने गले में नकली मोतियों की माला डाल ली थी! ”किसको दिखने जा रही हो!” कहकर चांटा!

अगले ही पल सन्नाटा मन में मुखर हो गया. उनको तीस साल पहले ऐसी ही बात पर अपनी पत्नि को थप्पड़ रसीद करना जो याद आ गया था! वह भी ऑफिस जा रही थी. उस दिन कोई पार्टी आयोजित थी. सोने की चेन तो डर के मारे पहन नहीं पा रही थी, सो कंजकों को दी हुई मोतियों की मालाओं में से एक बच गई थी, उसने गले में डाल ली थी और पति के प्रकोप का शिकार होना पड़ा. वह चुपचाप आंसू पी गई थी. तब से आंसू ही पिए जा रही है. पति को उसके आंसुओं की भनक तक नहीं पड़ी. वह दूसरे की बेटी जो थी, अब बात अपनी बेटी की थी!

बेटी की शारीरिक-मानसिक पीड़ा ने अब उसे पत्नि की शारीरिक-मानसिक पीड़ा का अहसास करा दिया था. समय-चक्र में तो रिवर्स गियर होता ही नहीं, जो वह समय को सही कर पाता, लेकिन पश्चाताप तो कर ही सकता था न!

पश्चाताप चक्र ही अब उसका अगला पड़ाव था. शायद पत्नि की शारीरिक-मानसिक पीड़ा में तनिक कमी आ जाए!

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “पश्चाताप चक्र

  1. गलत कार्य हो जाने के बाद, पश्चाताप करने से उसे दुबारा न करने का साहस मिलता हैं और हमारे अंदर शक्ति और ऊर्जा का संचार होता हैं. पश्चाताप की अग्नि में ख़ुद को इतना भी मत जलाओ कि तुम्हारा अस्तित्व खत्म हो जाए, बल्कि कुछ ऐसा करो कि तुम्हारा जीवन धन्य हो जाए. पति ने ऐसी ही कोशिश की थी.

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