लघुकथा

आत्मिक सुख!

उसकी एक कविता ‘चौबारे पर कबूतर’ पर प्रकृति प्रेमी इंद्रेश उनियाल की प्रतिक्रिया आई थी-

”मैंने अपने घर में एक विशेष स्थान बनाया है जिसमें कबूतर आकर विश्राम करते हैं, विशेषकर गर्मियों के समय उन्हें छाया मिलती है. गौरेयाओं के घोंसले बनाने के लिये लकड़ी के घर लगाये हुए हैं. और वृक्षों पर भी विभिन्न पक्षी आकर विश्राम करते हैं, घोंसले भी बनाते हैं. मेरे विचार में यह मेरा पर्यावरण संरक्षण के लिये अपनी ओर से एक तुच्छ प्रयास है, पशु, पक्षी और वृक्ष मुझे आत्मिक सुख प्रदान करते हैं.”

”वाह क्या बात है!” उसने प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया में लिखा, ”आप पशु-पक्षियों को आत्मिक सुख प्रदान करते हैं और पशु-पक्षी-वृक्ष आपको. देखा जाये तो पर्यावरण संरक्षण के लिये आपका यह एक तुच्छ प्रयास नहीं, बल्कि अनूठा प्रयास है.”

”पक्षी जब उड़ते हैं, तो उनकी उड़ान का नजारा तो द्रष्टव्य होता ही है, उनकी उड़ान की शीतल वायु मेरे फेफड़ों को मजबूती देती है, ऐसा मैंने केवल पढ़ा ही नहीं, मुझे महसूस भी होता है.” इंद्रेश उनियाल ने फिर लिखा.

”आप उनके लिए जो दाना-पानी रखते होंगे, उसे जब वे खाते-पीते होंगे, तो भी आपको अत्मिक सुख की प्राप्ति होती होगी.” चैट आगे बढ़ रही थी.

”अत्यंत आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है, इसमें कोई शक नहीं है. एक बात और बताऊं,” अत्यंत हर्षित प्रकृति प्रेमी इंद्रेश शायद कुछ बताने को बहुत उत्सुक थे, ”मैं जब उनकी फोटो खींच रहा होता हूं, तो मेरी पत्नि शैला या बेटियां मेरी फोटो खींचकर मुझे भेज देती हैं.”

”यह तो आत्मिक सुख पर आत्मिक सुख हो गया!”

”बिलकुल सही कहा. मुझे ऐसा महसूस होता है, कि सिर्फ मैं ही पर्यावरण संरक्षण के लिये प्रयासरत नहीं हूं, अगली पीढ़ी के साथ भी इसके तार जुड़े हैं.”

इंद्रेश के इस अनूठे प्रयास ने उसे ही नहीं, पूरे कविता-समूह को साथ-साथ रहने की प्रेरणा से प्रेरित किया था. इस आत्मिक सुख का जवाब नहीं.

”घर में एक गमले में एक पौधा लगाकर तो देखिए, जीवन प्रेममय हो जाएगा.” इद्रेश की बात में गहराई और आत्मिक सुख का अथाह सागर समाया हुआ था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

2 thoughts on “आत्मिक सुख!

  1. इंद्रेश उनियाल के प्रकृति प्रेम की ऐसी प्रतिक्रियाएं अक्सर आती रहती हैं, इसलिए सुदर्शन खन्ना ने उन्हें प्रकृति प्रेमी की उपाधि से विभूषित किया है.

  2. आज के युग में जब हम पर्यावरण संरक्षण के अपने कर्त्तव्य से विमुख होते जा रहे हैं. पर्यावरण संरक्षण के लिये इंद्रेश उनियाल का ऐसा अनूठा प्रयास करने से आत्मिक सुख की प्राप्ति होना अवश्यम्भावी है, साथ ही औरों के लिए अनुपम प्रेरणा भी. लघुकथा मंच पर इस लघुकथा को बहुत सराहा गया है.

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