कविता

अनुबंध

प्रेम के संदर्भ में जब अनुबंध की बात होती है तो मुझे अनायास ही याद आती है ” उर्मिला ” की।

अहा ! कैसा निर्मम अनुबंध , वियोग लेना है और उस पर नहीं रोने की शर्त ।

क्या कोई व्रत , तपस्या , हठयोग इस अनुबंध से कठिन हो सकते हैं ????

इसी भाव से प्रस्तुत है ये रचना

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तोड़ा न जाए इक बिरहन से
यह अश्रु का अनुबंध नयन से

ठहरी है पलकों पर , न ढ़लके
बिन्दु में सिन्धु , किन्तु न छलके
व्रत वेदिका पर वाहित व्यथाएँ
कहती है करुणा दारुण कथाएँ

रुदन से वर्जित रूठी शयन से
यह अश्रु का अनुबंध नयन से

कुल गौरव की भेंट चढ़ीं है
विधि वर्जना ये किसने गढ़ीं है
निरमोही पिया पीर न जाने
मिथ्याव्रती जग विरह बखाने

हृदय संतप्त तप की तपन से
यह अश्रु का अनुबंध नयन से

समर नाथ मिश्र
रायपुर

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